वूमेन ओनली- मेट्रो में औरतों के लिए लेडीज़ कोच
(पिछले दिनों दिल्ली मेट्रो में एक लेडीज़ कोच आरक्षित कर दिया गया. मुझे नहीं लगा था कि इससे कोई ख़ास फर्क पड़ेगा. पर जब मैंने पहली बार उससे यात्रा की तो जो भाव मन में उठे, उन्हें ही यहाँ लिख दिया.)
पहले-पहल 'वूमेन ओनली' देखकर
मन ठिठका
इस धरती पर ऐसी भी जगह हो सकती है
जो आरक्षित हो केवल औरतों के लिए
'नहीं हमें आरक्षण नहीं चाहिए'
बोला गर्वित मन
लेकिन,
याद आ गयी वो धक्का-मुक्की
भीड़-भाड़ की आड़ में
छेड़छाड़ औरतों के शरीर से
और विरोध करने पर उन्हें ही उलाहना
"छूए जाने का इतना डर है तो घर में बैठें
या चलें अपने निजी वाहन से"
अंदर चढ़ी तो देखा
इत्मीनान से भरा एक माहौल
आत्मविश्वास से चमकतीं लड़कियाँ
कुछ खड़ी, कुछ बैठीं
बेहिचक ठहाके लगाती हुईं
आराम से बैठी औरतें
आपस में बतियाती हुईं,
पसरा हुआ सबके बीच एक बहनापा
अनजाने ही सही
एक लेडीज़ कम्पार्टमेंट से
कितना फर्क पड़ सकता है
बाहर निकलने वाली औरतों के जीवन में,
एक स्पेस, जो उनका अपना है
जो स्कूल नहीं, कॉलेज नहीं, घर नहीं, आफिस नहीं,
एक ऐसी जगह, जहाँ औरत सिर्फ औरत है
और जहाँ बैठकर, वह कुछ पल के लिए ही सही
महसूस कर सकती है
अपने आप को.
(अनुराधा चतुर्वेदी "मुक्ति" के ब्लॉग से साभार )
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें