रविवार, 14 नवंबर 2010

पत्रकार कहीं क्रांतिकारी हिंसा की ओर न जाने लगे

पत्रकारिता में जिस तरह से पूंजीवादी शक्तियों का शोषण बढ़ता जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसी संभावना बन सकती है कि पत्रकार क्रांतिकारी हिंसा का रास्ता अपनाकर चुन-चुन कर उन लोगों को मारे जो इस मानवीय क्षेत्र को पाशविक शोषण का शिकार बनाए हुए हैं. पत्रकारिता में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं, जिनके अंदर खुदी राम बोस, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह वाला ज़ज्बा पलता है, लेकिन इस देश में उस ज़ज्बे की चिंगाड़ी को शोला बनाने वाली विचारधारा का अभाव है.

पूरे विश्व के इतिहास में दो विरोधी धारा हमेशा आपस में द्वन्द्व करते रहे हैं. पूंजीवादियों ने शोषण को जायज ठहराया और शोषण के नए-नए तरीके विकसित किये. वहीं शोषित लोगों ने हथियार उठाकर या अहिंसक तरीके से उनका प्रतिरोध करते रहे. आज का समय अहिंसक तरीकों से विरोध करने का नहीं है. इस तरीके से अब अब शैतानी ताकतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.
आज के युग में व्यक्तियों के एकजुट होकर आंदोलन करने का भी समय नहीं रह गया है क्योंकि सभी अपनी अपनी समस्याओं के समाधान की चिंता में रहते हैं और उनकी समस्या का समाधान होते ही वो दूसरों की समस्या भूल जाते हैं. मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूँ, जो जब तक शोषित रहे तब तक पत्रकारिता जगत को शोषण मुक्त बनाने के लिए आंदोलन की बड़ी-बड़ी बातें करते रहे, लेकिन जैसे ही उनकी समस्याओं का समाधान हुआ यानी उन्हें अच्छे वेतन की नौकरी मिली, वे सब भूल गए.
ऐसी हालत में एक व्यापक आंदोलन की संभावना क्षीण है. मार्क्सवादी नज़रिए से भी इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता क्योंकि सर्वहारा पत्रकारों में कई तरह के वर्ग हैं. उनमे आपसी फूट है इसलिए ऐसा नारा तो बेकार है कि 'भारत के सभी पत्रकारों एक हो.’ दरअसल शोषण करनेवाली बिरादरी भी पत्रकार ही है जिनको ऊँचा वेतन दिया जाता है.
इसलिए अब खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह वाली विचारधारा के जिंदा होने का समय आ गया है. आज की पूंजीवादी शक्तियां अंग्रेजों से भी ज्यादा खतरनाक हैं, ये समाज और देश के लिए घातक हैं. इसका खात्मा अहिंसक तरीके से कठिन ही लगता है. उम्मीद है कि भविष्य में पत्रकारों की छोटे-छोटे समूह शोषण से उबकर क्रांतिकारी हिंसा करेंगे और ऐसे शोषकों को चुन-चुन कर मारेंगे. पत्रकारों जैसे बुद्धिजीवी वर्ग का जिस तरह से भयानक शोषण हो रहा है वह एक न एक दिन मजबूर होकर हथियार उठा ले, तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.



लेखक राजीव सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

भड़ास4मीडिया

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