• अषिनव
ज न ू 2020 में मोदी सरकार ने कृ षि-सम् बन् धी तीन अध् यादेश पेश षकये और षसतम् बर 2020 में लोकसभा और
राज् यसभा में काफ़ी हो-हल् ले के बीच उन् हें पाररत कर षदया गया। अचानक सभी प ूँज ू ीवादी पाषटियाूँ षकसानों के पक्ष
में खडी हो गयीं। यहाूँ तक षक कुछ अनपढ़ “मार्क सिवादी” भी धनी षकसानों व कुलकों के आन् दोलन के मंच पर
‘बेगानी शादी में अब् द ल् ु ला दीवाना’ के तर्जि पर अपना कें च ल
नृत् य पेश करने लगे ! षशरोमषि अकाली दल क़ी
सांसद व के न् र सरकार में मंत्री हरषसमरत कौर ने इस् तीफा दे षदया और उनक़ी पाटी ने भाजपा के साथ गठबन् धन पर
“प न ु षविचार” क़ी धमक़ी दे दी। संसदीय वामपन्थी भी कुलकों और धनी षकसानों के स र ु में स र ु षमलाते हुए
लाभकारी म ल् ू य को बचाने क़ी इस कव् वाली में ताली पीटने लगे। कुछ तथाकषथत “मार्क सिवादी”, पर असल म
कौमवादी भी इस कव् वाली में ताल देने के षलए अपना “स घ ं वाद” का ढोलक लेकर पहु च ूँ गये। मतलब, अच् छी-
खासी भसड मच गयी।
इस सारी भसड में वे म द्द ु े गायब थे या पीछे हो गये थे , षजन पर खडे होकर मर्जद र ू वगि और गरीब षकसानों को इन
अध् यादेशों/कान न ू ों का षवरोध करना चाषहए। अषधका श
राजनीषतक शषियाूँ इन अध् यादेशों के र्जररये लाभकारी
म ल् ू य क़ी व् यवस् था के खत् म होने पर छाती पीट रही थीं, कुछ तथाकषथत “मार्क सिवादी” भारत के संघीय ढाूँचे पर
मोदी सरकार के हमले और इन अध् यादेशों के र्जररये “कौमी दमन” (??!!) पर स् यापा कर रहे थे , तो कुछ कृ षि
उत् पाद षवपिन व् यवस् था यानी सरकारी मषडियों के खत् म होने पर रो रहे थे। लेषकन असली सवाल गायब थे।
मौज द ू ा लेख में हम षवस् तार से चचाि करें गे षक इन कृ षि-सम् बन् धी अध् यादेशों से षकन् हें लाभ होगा, षकन् हें न क
सान
होगा, मौज द ू ा षकसान आन् दोलन का वगि चररत्र र्क या है , और र्क या मर्जद र ू वगि इन अध् यादेशों के मर्जद र ू व गरीब-
षवरोधी प्रावधानों का षवरोध गाूँव के प ूँज ू ीपषत वगि , यानी धनी षकसानों व कुलकों के म च
से कर सकता है ?
सबसे पहले इन तीन अध् यादेशों के म ख् ु य प्रावधानों पर गौर कर लेते हैं।
1.कृषि-सम्बन्धीतीनअध्यादेश:इनअध्यादेशोंमेंक्याहै ?
इनतीनोंअध्यादेशोंके प्रावधानोंमेंसबसेप्रम ख
यहहैषकसरकारनेखेतीके उत्पादकीख़रीदके क्षेत्र
में , यानीखेतीके उत्पादके व्यापारके क्षेत्रमें उदारीकरणकारास्तासाफ़करषदयाहै। पहले अध् यादेश
यानी ‘फामि प्रोि्य स ू ट्रेि एड ि कॉमसि (प्रमोशन एड ि फै षसषलटेशन) ऑषििनेंस ’ का म ल
षबन् दु यही है। अब कोई भी
षनजी खरीदार षकसानों से सीधे खेती के उत् पाद खरीद सके गा, जो षक पहले ए.पी.एम.सी. (एग्रीकल् चरल प्रोि्य स ू
माके षटंग कषमटी) क़ी मषडियों में सरकारी तौर पर षनधािररत लाभकारी म ल् ू य पर ही कर सकता था। यानी, खेती कउत् पादों क़ी क़ीमत पर सरकारी षनय त्र ं ि और षवषनयमन को ढीला कर षदया गया है और उसे ख ल
े बार्जार क़ी गषत
पर छोडने का इन् तर्जाम कर षदया गया है।
धनी षकसानों व कुलकों को िर है षक इसक़ी वजह से उन् हें सरकार द्वारा तय म ल् ू य स ष ु नषित नहीं हो पायेगा और
कारपोरे ट खरीदार कम क़ीमतों पर सीधे खेती के उत् पाद क़ी खरीद करें गे। हो सकता है षक ये श रू
में अषधक क़ीमत
दें , लेषकन बाद में , अपनी इजारे दारी कायम होने के बाद, ये षकसानों को कम क़ीमतें देंगे। सरकार ने इन सरकारी
मषडियों और लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था को औपचाररक तौर पर खत् म नहीं षकया है , लेषकन इसका नतीजा
यही होगा षक ये मषडियाूँ कालान् तर में समाप् त हो जायेंगी या वे बचेंगी भी तो उनका कोई ज् ़यादा मतलब नहीं रह
जायेगा। वजह यह है षक इन मषडियों के बाहर व् यापार क्षेत्रों में होने वाले षवपिन में षकसानों व व् यापाररयों पर कोई
श ल् ु क या कर नहीं लगाया जायेगा। नतीजा यह होगा षक लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था भी प्रभावत: समाप् त हो
जायेगी, भले ही उसे औपचाररक तौर पर समाप् त न षकया जाये।
इसषलए मौजूदा षकसान आन्दोलन के के न्र में लािकारी मूल्य का सवाल है और यही उसके षलए
सबसे अहम मुद्दा है या कह सकते हैं षक उसके षलए यही एकमात्र मुद्दा है। इस पहले ही अध् यादेश म
सरकारी मड िी के बाहर होने वाली खरीद को तमाम करों व श ल् ु कों से म र्क ु त करने और षववाद के षनपटारे क़ी
व् यवस् था के प्रावधान भी हैं , षजनका षकसान संगठन षवरोध कर रहे हैं। लेषकनइनकािीररश्तामूलत:यह
सुषनषितकरनेसेहीहैषकलािकारीमूल्यषमले।
मौज द ू ा आन् दोलन जो मुख् यत: हररयािा और पंजाब में जारी है और कुछ हद तक तषमलनािु और आन्रप्रदेश म
जारी है , उसक़ी म ल
और म ख् ु य आपषि इस पहले अध् यादेश के प्रावधानों पर ही है , जो षक कृ षि उत् पाद के व् यापार
पर से ए.पी.एम.सी. मड िी के एकाषधकार को समाप् त करता है। यह लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था को भी एक
प्रकार से षनष्प प्रभावी बना देगा। इन दो राज् यों के अलावा, अन् य राज् यों में इस आन् दोलन का कोई खास असर नहीं
है या बेहद कम असर है। महाराष्प ट्र के षकसानों के संगठन जैसे षक शेतकरी संगठन के अषनल घनवत और
स् वाषभमानी पक्ष के राजू शेट्टी ने इन अध् यादेशों का स् वागत षकया है। सरकारी खरीद का 70 प्रषतशत से भी ज़्यादा
हररयािा और पंजाब से होता है। 2019-20 में ही 80,294 करोड रुपये का धान और गेह ूँ लाभकारी मूल् य पर
खरीदा गया था।
द स ू री षचन् ता जो षक इस पहले अध् यादेश से पैदा हुई है वह आढ़षतयों क़ी है। पंजाब में ही 28,000 से ज़्यादा
आढ़ती हैं। इन् हें लाभकारी मूल् य के ऊपर 2.5 प्रषतशत का कमीशन षमलता है। पंजाब और हररयािा में इस
कमीशन से इन आढ़षतयों ने षपछले विि 2000 करोड रुपये कमाये हैं। अर्क सर धनी षकसान व कुलक ही आढ़ती व
मध् यस् थ व् यापारी क़ी भ ष ू मका में भी होते हैं , स द ू खोर क़ी भ ष ू मका में भी होते हैं , और षनम् न मूँझोले और गरीब
षकसानों से लाभकारी मूल् य से काफ़ी कम दाम पर उत् पाद खरीदते हैं और उसे लाभकारी म ल् ू य पर बेचकर और
साथ ही कमीशन के र्जररये म न ु ाफा कमाते हैं।
इसके अलावा, राज् य सरकारों को भी ए.पी.एम.सी. मड िी में होने वाली षबकवाली पर कर प्राप् त होता है , जैसे षक
पंजाब में धान और गेह ूँ पर 6 प्रषतशत, बासमती चावल पर 4 प्रषतशत और कपास और मर्क का पर 2 प्रषतशत
श ल् ु क षलया जाता है। षपछले विि पंजाब सरकार को इससे 3500 से 3600 करोड रुपये का राजस् व प्राप् त हुआ था।
पंजाब और हररयािा के षकसान संगठनों का कहना है षक यषद यह राजस् व प्राप् त नहीं होगा तो राज् य सरकार गाूँवके अवस र ं चनागत ढाूँचे को बेहतर नहीं बना पायेगी और षकसानों के षलए अपने उत् पाद क़ी षबकवाली और
पररवहन और भी म ष ु ककल हो जायेगा। लेषकन महाराष्प ट्र के षकसान स ग ं ठनों के नेताओ ं जैसे षक शेट्टी और घनवत
का कहना है षक इस राजस् व से वैसे भी ग्रामीि अवस र ं चनागत ढाूँचे में कोई खास षनवेश नहीं होता था और इसक
हट जाने पर भी षनजी षनवेशक कृ षि उत् पाद के षवपिन के त त्र ं को च स् ु त-द रु ु स् त करने के षलए आवक यक
अवस र ं चना में षनवेश करें गे र्क योंषक यह उनके षलए भी र्जरूरी होगा।
द स ू री बात यह है षक सभी षकसान स ग ं ठन ए.पी.एम.सी. मषडियों के एकाषधकार खत् म होने पर अलग से आपषि
नहीं कर रहे हैं बषल्क षसफि इसषलए आपषि कर रहे हैं र्क योंषक यह लाभकारी म ल् ू य को स ष ु नषित करती थी।
इसीषलए अषखल भारतीय षकसान सभा के षवजू कृ ष्प िन ने स् पष्प ट शब् दों में कहा षक सरकार यदि लाभकारी म ल् ू य
को दकसानों का कान न ू ी अदिकार बना िे तादक कोई दनजी ख़रीिार भी लाभकारी म ल् ू य िेने के दलए बाध् य हो, तो
उन् हें ए.पी.एम.सी. मण् डी के एकादिकार के समाप् त होने से कोई दिक़्ककत नहीं है।
द स ू रे अध् यादेश का नाम है ‘षद फामिसि (एम् पावरमेड ट एड ि प्रोटेर्क शन) एग्रीमेड ट ऑन प्राइस अक योरें स एड ि फाम
सषविसेर्ज ऑषििनेंस ’ षजसके अन स ु ार षकसान अब अपने उत् पाद को ए.पी.एम.सी. मड िी के लाइसेंसधारी व् यापारी
के र्जररये बेचने के षलए बाध् य नहीं हैं और साथ ही वे षकसी भी कम् पनी, स् पॉन् सर, षबचौषलये के साथ षकसी भी
उत् पाद के उत् पादन के षलए सीधे करार कर सकते हैं। इसके षलए उन् हें ए.पी.एम.सी. के लाइसेंसधारी आढ़षतयों या
व् यापाररयों के र्जररये जाने क़ी आवक यकता नहीं है। इसके तहत उत् पादन शुरू होने से पहले ही उत् पाद क़ी तय मात्रा,
तय ग ि ु वत् ता व षकस्म तथा तय क़ीमतों के आधार पर षकसान और षकसी भी षनजी स् पांसर, कम् पनी, आषद क
बीच करार होगा। इस करारनामे क़ी अषधकतम अवषध उन सभी उत् पादों के मामले में पाूँच विि होगी षजनक
उत् पादन में पाूँच विि से अषधक समय नहीं लगता है। इसके र्जररये अषनवायि वस् त ओ
ं के स् टॉक पर रखी गयी
अषधकतम सीमा को भी हटा षदया गया है। यानी अब तमाम अषनवायि वस् त ओ
ं क़ी जमाखोरी पर षकसी प्रकार क़ी
रोक नहीं होगी, जोषक कालान् तर में इन वस् त ओ
ं जैसे षक आल , ू प् यार्ज आषद क़ी क़ीमतों को बढ़ा सकता है।
अपनेआपमेंठे काखेतीके आनेसेआममेहनतकशआबादीकोकोईषवशेिनुक़साननहींहोनेवाला
है। छोटाऔरम झ
ोलाषकसानपहले िीठे काखेतीकीव्यवस्थाकाषशकारथा।फ़क़ग बसयहथाषक
अिीतकठे काखेतीकीव्यवस्थामें उसे धनीषकसानवआढ़तीलूटरहे थे। अब इस ल ट ू के मैदान को
बडी इजारे दार प ूँज ू ी के षलए साफ कर षदया गया है। इसके नतीजे अलग-अलग देशों और अलग-अलग प्रान् तों म
अलग-अलग सामने आये हैं। पषिम बंगाल में पेप् सी कम् पनी के साथ आलू के उत् पादन क़ी ठे का खेती में षकसानों
को प्रषत षकलोग्राम 5 रुपये तक ज़्यादा षमल रहे हैं। वहीं आन्र प्रदेश में चन् रबाबू नायिू के म ख् ु यमंषत्रत् व में जो
ठे का खेती का मॉिल लागू षकया गया, उसमें धनी और मंझोले षकसानों को हाषन हुई। गरीब व षनम् न-मंझोला
षकसान तो पहले भी धनी व उच् च मध् यम षकसानों द्वारा ठे का खेती व अन् य तरीकों से ल ट ू ा ही जा रहा था। वह अब
बडी प ूँज ू ी द्वारा ल ट ू ा जायेगा। इसषलएठे काखेतीपरके षन्रतइसदूसरे अध्यादेशसे जोमूलपररवतगनहोने
वालाहै , वहके वलइतनाहैषकव्यापकग़रीबवषनम्न -मंझोलेषकसानके लूटकीधनीषकसानों, उच्च
मध्यमषकसानोंवआढ़षतयोंद्वाराइजारेदारीख़त्महोजायेर्ीऔरखेतीके क्षेत्रमें कारपोरेटपूूँजीके
बडे पैमाने पर प्रवेश के साथ धनी षकसान, कुलक व फामगरों के षलए प्रषतस्पर्द्ाग करना मुषश्कल हो
जायेर्ा।तीसरा अध् यादेश सीधे तौर पर आवक यक वस् तु कान न ू में पररवतिन करते हुए जमाखोरी और काला बार्जारी को
बढ़ाने क़ी छूट देता है र्क योंषक ये कई आवक यक वस् त ओ
ं क़ी स् टॉषकंग पर सीमा को य द्ध
जैसी आपात षस्थषतयों क
अषतररर्क त समाप् त कर देता है। यहतीसराअध्यादेशसीधे तौरपरमेहनतकशजनताके षहतोंके षवरुर्द्
जाताहै।यहवहअध्यादेशहै जोषकसीधे - सीधे आममेहनतकशजनताकोप्रिाषवतकरताहै और
उसके वर्ग षहतोंकोन क़
ाताहै औरषजसकाषवरोधषकये जाने कीसख् त ़ ज़रूरतहै।लेषकन
सानपह च
आप पायेंर्े षक धनी षकसानों व कुलकों के राजनीषतक स र् ं ठनों के नेतृत्व में जो मौज द ू ा षकसान
आन्दोलनजारीहै , वहइसतीसरेअध्यादेशपरज़्यादाकुछनहींबोलरहाहै।
इन अध् यादेशों का ररक ता साविजषनक षवतरि प्रिाली को स च ु ारू रूप से बहाल करने क़ी माूँग से भी ज ड ु ा हुआ है।
के न् र सरकार पहले से ही इस कोषशश में है षक वह साविजषनक षवतरि प्रिाली क़ी षर्जम् मेदारी से प र ू ी तरह से षपड ि
छुडा ले और यह षर्जम् मेदारी राज् य सरकारों पर िालने क़ी वकालत कर रही है। र्जाषहर है , इस प्रस् ताव का अथि ही
यह है षक साविजषनक षवतरि प्रिाली को प ि ू ि रूप से समाप् त कर षदया जाय जो षक व् यापक मेहनतकश आबादी
क़ी खाद्य स र ु क्षा को समाप् त कर देगी। इसषलए सम च ू े मर्जद र ू वगि , अद्धिसविहारा वगि तथा गरीब व षनम् न मध् यम
षकसान वगि क़ी एक माूँग यह भी बनती है षक साविजषनक षवतरि प्रिाली को स च ु ारू रूप से बहाल षकया जाये।
ल ब् ु बेलुबाबयहषकमौजूदाषकसानआन्दोलनषजनवजहोंसे कृषिअध्यादेशोंकाषवरोधकररहाहै ,
वहमूलत:औरमुख्यत:लािकारीमूल्यके सवालपरके षन्रतहै।इसकीमुख्यषचन्तायहहै षकइन
अध्यादेशोंके साथलािकारीमूल्यकीव्यवस्थासमाप्तहोजायेर्ी।इसषलएम ख्
य रूपसे र्ाूँवके
लेषकनसाथहीशहरके मज़दूरवर्ग और अर्द्गसवगहारावर्ग औरर्ाूँवके ग़रीबषकसानवअर्द्गसवगहारा
वर्गके षलएप्रमुखप्रश्नयहबनताहैषकलािकारीमूल्यपरउसकाक्यानज़ररयाहोनाचाषहए। तथ् यों स
सत् य का षनवारि होता है और इसषलए हम सबसे पहले कुछ तथ् यों पर नर्जर िालेंगे षजससे षक लाभकारी मूल् य क
लाभाथी वगि क़ी सही पहचान हो सके ।
2.लािकारीमूल् य कीव्यवस्था:षकसकाफ़ायदा, षकसकान क़
सान?
इस सच् चाई क़ी ओर हम पहले भी कई बार ‘मर्जद र ू षबगुल ’ में ध् यानाकषिित कर च क
े हैं और हमारे अलावा कई
अन् य प्रेक्षकों ने भी इसे स् वीकार षकया है षक लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था का लाभ म ख् ु यत: 4 से 6 प्रषतशत धनी
षकसानों व कुलकों को होता है। इसे आूँकडों से समझना र्जरूरी है इसषलए कुछ आूँकडों पर षनगाह िाल लेते हैं।
अभी हम पहले खेषतहर मर्जद र ू ों क़ी बात नहीं करें गे और के वल षकसानों पर के षन्रत करें गे।
2013कीनेशनलसैम्पलसवे ररपोटग के अनुसारदेशके एक-षतहाईषकसानोंके पास0.4हेक् ट े यरसे
कमज़मीनहै।उनकीकुलआमदनीकाके वलछठाषहस्सा, यानी16प्रषतशतहीखेतीसेआताहैऔर
अन्य84प्रषतशतउजरतीश्रमयानीमज़दूरीसे आताहै।इसके अलावाएक-षतहाईषकसानोंके पास
0.4 हेक् ट े यरसे1हेक्टेयरज़मीनहै।इनकीकुलआमदनीका40प्रषतशतखेतीसेआताहैऔरअन्य60
प्रषतशतमुख्यत:उजरतीश्रमसे आताहै।इनदोनोंकोषमलाषदयाजाये , तोकुलषकसानआबादीका
70प्रषतशतबनताहै।इन षकसानों को लाभकारी म ल् ू य षमलता ही नहीं है। र्क यों नहीं षमलता है , इस पर थोडा आगे आयेंगे। दूसरीअहम
बातयहहै षकये षकसानम ख्
यरूपसे कृषिउत्पादोंके ख़रीदारहैं , नषकषवक्रेता। नतीजतन, लाभकारी
म ल् ू य में होने वाली षकसी भी बढ़ोत् तरी से इन् हें फायदा नहीं बषल्क न क
सान होता है। वजह यह है षक लाभकारी
म ल् ू य के बढ़ने के साथ हमेशा ही कृ षि उत् पादों क़ी क़ीमतों और साथ ही अपने उत् पादन के षलए उन पर षनभिर
औद्योषगक उत् पादों क़ी क़ीमतों में भी बढ़ोत् तरी होती है।
आूँकडोंके अन स
ार, इन 70प्रषतशतषकसानोंकाअपने उपिोर् परख़चग इनकीआमदनीसे ज़्यादा
रहताहै।नतीजतन, अपने खेतोंपरकामकरने के षलएचाल ू प ूँज
ी(working capital)के षलएये ऋण
परषनिगररहते हैं। यह ऋि इन् हें षवत् तीय स स् ं थाओ ं से नहीं षमलता र्क योंषक बैंकों व अन् य षवत् तीय स स् ं थाओ ं क
ऋि तक इनक़ी पहु च ूँ ही नहीं है। षफर इन् हें ये ऋि कौन देता है ? ये ऋि इन् हें धनी षकसान, कुलक व आढ़ती देत
हैं। अर्क सर धनी षकसान ही कृ षि उत् पादों का व् यापारी व आढ़ती भी होता है और इन गरीब षकसानों के षलए ल ट ु ेरा
स द ू खोर भी। चूंषक 70 प्रषतशत बेहद ग़रीब षकसान इनके ऋणों तले दबा होता है , इसषलए ये धनी
षकसान, कुलकवआढ़तीइन्हेंलािकारीमूल्यवबाज़ारक़ीमतसेबेहदकमदामपरअपनेउत्पादको
उन्हें बेचने के षलएबाध्यकरते हैं।इसके अलावा, ग़रीबऔरषनम्नमध्यमषकसानइसषलएिीसीधे
मषडियोंतकपह ूँचनहींरखतेक्योंषकउसके षलएपररवहनकीसुषवधातथापूूँजीकीआवश्यकताहोती
है , जोषकइनके पासहोतीहीनहींऔरवेअपनेउत्पादके षवपणनके षलएइसषलएिीग्रामीणक्षेत्रके
पूूँजीपषतवर्ग यानीधनीषकसान, कुलक, आढ़षतयोंवसूदखोरोंपरषनिगरकरते हैं।इसउत्पादकोये
धनीषकसान, कुलकवआढ़तीलािकारीमूल्यपरबेचते हैं औरसाथहीआढ़तीइसलािकारीमूल्य
के ऊपरकमीशनिीकमातेहैं।
देशके 92प्रषतशतषकसानोंके पास2हेक् ट े यरसे कमज़मीनहै।यानीषकग़रीबऔरबेहदग़रीबव
पररषधर्तषकसानआबादीकोजोडदें , तोकुलषकसानआबादीका92प्रषतशतबनताहै।येवेषकसान
हैं षजन्हें लािकारीमूल्यकायातोकोईलािनहींषमलताऔरनुक़सानहोताहै , याषफरज़्यादासे
ज़्यादा इसके बेहद छोटे उच्चतम षहस्से को कुछ नर्डय लाि षमलता है। ये वे षकसान हैं जो कृषि
उत्पाद, मुख्यत: खाद्यान्न के ख़रीदार हैं , न षक षवक्रेता। इन्हें लािकारी मूल्य और उसमें होने वाली
बढ़ोत्तरीसेकुछिीहाषसलनहींहोताहै , उल्टेनुक़सानहोताहै।
षफर लाभकारी मूल् य से लाभ षकसे होता है ? इस पर भी तथ् यों को देख लेते हैं।
देशके कुलषकसानोंमेंसेके वल4.1प्रषतशतषकसानहैंषजनके पास4हेक् ट े यरयाउससेज़्यादाज़मीन
है।इनकीआमदनीकातीनचौथाईषहस्साखेतीसे आताहै। बाक़ी भी कमीशन व स द ू खोरी आषद से ही
आता है , उजरती श्रम से कम ही आता है। यानी इनक़ी घरे लू अथिव् यवस् था खेती से आने वाली आमदनी पर षटक़ी
हुई है। याद रखें , ये आम तौर पर वे षकसान हैं , जो उजरती श्रम का शोिि करके ही खेती कर सकते हैं। ये स् वय
अपने और अपने पररवार के श्रम के ब त ू े खेती नहीं करते। वास् तव में , ज् ़यादातर मामलों में वे स् वयं खेत में श्रम करत
ही नहीं हैं और इनके खेतों में उत् पादक श्रम प र ू ी तरह से उजरती श्रम करने वाले खेत मर्जद र ू या गरीब षकसान होत
हैं। ये वह वगि है जो कोई कर नहीं देता है , षजन् हें सभी कर्जि माफ़ी क़ी योजनाओ ं का लाभ षमलता है और जो
लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था के लाभाथी हैं। इन् हें “अन् नदाता” कहना एक भद्दा मर्जाक है। अगर ये धनी षकसान वकुलक अन् नदाता हैं , तो ररलाय स ं गैसदाता है , षलबटी ज त ू ादाता है , टाइटन घडीदाता है , इत् याषद। यह तकि वही ह
जो नरे न् र मोदी ने षदया है: षक प ूँज ू ीपषत समृषद्ध पैदा करता है। सच यह है षक खेषतहर मर्जद र ू और गरीब षकसान
देश के अन् नदाता हैं और धनी षकसान और कुलक इन मेहनतकश वगों क़ी श्रमशषि को ल ट ू ने वाले परजीवी वग
हैं।
शान्ताकुमारकमेटीकीरपटके अन स
ारदेशके सिीषकसानोंमें से के वल5.8प्रषतशतषकसानही
लािकारीम ल् ू यपरअपने उत्पादकोबेचपाते हैं औरये िीअपने उत्पादका14से 35प्रषतशतही
लािकारीम ल् ू यपरबेचपाते हैं। वजह यह है षक लाभकारी म ल् ू य का भी प र ू ा लाभ के वल धनी षकसान व
कुलक ही उठा पाते हैं , न षक उच् च मध् यम व मध् यम षकसान।
अब देखते हैं षक लाभकारी मूल् य के बढ़ने का मेहनतकश आबादी पर र्क या असर पडता है।
2016 में अन् तरराष्प ट्रीय म र ु ा कोि ने एक रपट पेश क़ी षजसे सज् जाद षचनॉय, प क
ज कुमार और प्राची षमश्रा न
षलखा था। यह रपट भारत में लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था और कृ षि उत् पाद क़ी क़ीमतों पर षवस् तार से चचाि करती
है। इसके अनुसार, लािकारीमूल्यके बढ़ने कासबसे ज़्यादानुक़सानग्रामीणऔरशहरीमज़दूरवर्ग
औरग़रीबषकसानोंकोहोताहै। वजह यह है षक जब भी लाभकारी म ल् ू य बढ़ता है तो खाद्यान् न महूँगा होता ह
और साथ ही वे औद्योषगक उत् पाद भी मह ग ं े होते हैं , जो अपने उत् पादन के इनप ट ु यानी कच् चे माल के तौर पर कृ षि
उत् पादों का उपयोग करते हैं। र्जाषहर है ऐसे औद्योषगक मालों के दायरे में बडे पैमाने पर वे वस् त ए ु ं आती हैं , जो
व् यापक मेहनतकश आबादी खरीदती है। नतीजतन, एकओरखाद्यान्नकीक़ीमतें बढ़तीहैं औरदूसरीओर
मज़दूरों-मेहनतकशोंद्वाराख़रीदेजानेवालेग़ैर -खेतीउत्पादोंकीक़ीमतोंमेंिीव ष ृ र्द्होतीहै।
खाद्यान् न क़ी माूँग में एक हद तक ही लचीलापन होता है और वह ज् ़यादा रूढ़ होती है , इसषलए बढ़ती क़ीमतों क
बावज द ू उनक़ी माूँग एक स् तर से नीचे नहीं षगर सकती है। लेषकन अन् य वस् त ओ
ं क़ी माूँग में अषधक लचीलापन
होता है और नतीजतन उनक़ी माूँग में षगरावट आती है। इनसबकानतीजायहहोताहैषकमज़दूरोंऔरआम
मेहनतकशआबादीके पररवारोंके ख़चग में खाद्यान्नपरख़चग होने वालाषहस्साअपने आपमें तोकम
होताहै , लेषकनअन्यवस्त ओ
ं वसेवाओ ं परहोने वाले ख़चग कीतुलनामें बढ़ताहै।सरलशब्दोंमेंकहें
तोएकओरआममेहनतकशआबादीपहले से कमिोजनकाउपिोर्करतीहै औरउसकीिोजन
सुरक्षाघटतीहै , मर्रषफरिीवहअपनीआमदनीकापहले से ज़्यादाबडाषहस्सािोजनपरख़चग कर
रहीहोतीहै औरनतीजतन, अन्यवस्तुओ ं औरसेवाओ ं काउपिोर्वहपहले से कमकरतीहै , षजसके
कारणइनवस्तुओ ं औरसेवाओ ं कीकुलघरेल ू माूँर्मेंिीकमीआतीहै।
इसकानतीजािीयहहोताहै षकमुनाफ़े कीदरके संकटकीषशकारपूूँजीवादीअथगव्यवस्थाघरेल ू
माूँर्के षसमटनेके कारणसंकटके िंवरमेंऔरिीर्हरीफंसजातीहै , क्योंषकउत्पाषदतमालोंकान
षबकपाना(वास्तवीकरणकासंकट)अपनेआपमेंसंकटकाकारणनहींहोता, लेषकनपहलेसेमौजूद
मुनाफ़े कीऔसतदरके षर्रने के संकटकोबढ़ावादेताहै।अन्तमें , इसकीक़ीमतिीमज़दूरवर्ग ही
चुकाताहैक्योंषकषनवेशकीदरइससंकटके कारणषर्रतीहैऔरमज़दूरवर्गकोछंटनीवतालाबन्दी
औरनतीजतनबढ़तीबेरोज़र्ारीऔरघटतीऔसतमज़दूरीकासामनाकरनापडताहै।3.औद्योषर्कप ज
ीपषतवर्ग औरकृिकप ज
ीपषतवर्ग के बीचअन्तरषवरोधऔर
मज़दूरवर्गकीअवषस्थषत
खाद्यान् न क़ी क़ीमतों और खेती के उत् पादों पर अपने उत् पादन के षलए षनभिर औद्योषगक उत् पादों क़ी क़ीमतों म
बढ़ोत् तरी औद्योषगक प ूँज ू ीपषत वगि के षलए भी ब र ु े शकुन के समान होती है। यह एक ओर औसत मर्जद र ू ी पर
बढ़ोत् तरी का दबाव पैदा करती है और वहीं द स ू री ओर उन औद्योषगक उत् पादों क़ी कुल माूँग में कमी लाती है , जो
षक मर्जद र ू वगि और आम मेहनतकश आबादी खरीदती है , यानी षक तमाम गैर -षटकाऊ उपभोर्क ता सामषग्रयाूँ।
औद्योषगक प ूँज ू ीपषत वगि के षलए भी यह अच् छा नहीं होता है र्क योंषक एक ओर उसके द्वारा उत् पाषदत गैर -षटकाऊ
उपभोर्क ता सामषग्रयों क़ी माूँग पहले से घटती है और एक वास् तवीकरि (यानी अपना माल बेच पाने) क़ी समस् या
पैदा होती है और द स ू री ओर औद्योषगक मर्जद र ू वगि क़ी औसत मर्जद र ू ी पर बढ़ने का दबाव पैदा होता है। षनषित
तौरपर, मज़दूरोंकोबेचीजाने वालीग़ैर -खेतीवस्तुओ ं औरसेवाओ ं कीमाूँर्में कमीअपने आपमें
पूूँजीवादीसंकटपैदानहींकरतीहै(क्योंषकपूूँजीवादीसंकटकामूलमुनाफ़े कीऔसतदरके षर्रनेका
संकटहै जोषकपूूँजीपषतवर्ग कीआपसीख़रीदमें कमीआने में अषिव्यक्तहोताहै , षजसकाबडा
षहस्साउत्पादनके साधनोंकीख़रीद-फ़रोख़्तहोताहै) , लेषकनवे पूूँजीवादीसंकटकोतीव्रकरतीहैं।
लेषकन औसत मर्जद र ू ी में बढ़ोत् तरी म न ु ाफे क़ी औसत दर को और भी घटाती है र्क योंषक कुल उत् पाषदत म ल् ू य म
यषद मर्जद र ू ी का षहस् सा बढ़ता है तो म न ु ाफे का षहस् सा सापेषक्षक रूप से घटता है। एक ओर प ूँज ू ी के बढ़त
आवयषवक संघटन के कारि और द स ू री ओर औसत मर्जद र ू ी में बढ़ोत् तरी के दबाव के कारि प ूँज ू ीवादी आषथिक
संकट पैदा होता है और मर्जद र ू ों द्वारा खरीदे जाने वाले औद्योषगक उत् पादों क़ी माूँग में कमी के कारि उसके सामन
वास् तवीकरि का जो संकट पैदा होता है , वह इस संकट को और भी तीव्र बना देता है।
औसत मर्जद र ू ी पर बढ़ने के षलए पैदा होने वाले दबाव के बावज द ू औद्योषगक प ूँज ू ीपषत वगि मर्जद र ू वगि क़ी औसत
मर्जद र ू ी को बढ़ने से रोकने का हर सम् भव प्रयास करता है , षजसका नतीजा मर्जद र ू वगि को भ ग ु तना पडता है।
लेषकन अर्र खाद्यान्नों व खेती के उत्पादों की क़ीमतें बढ़ती रहती हैं और इसकी वजह से उन
औद्योषर्कउत्पादों(षजन्हें मज़दूरख़रीदते हैं)कीक़ीमतें बढ़तीरहतीहैं जोषकखेतीके उत्पादोंको
अपनेउत्पादनके कच्चेमालके तौरपरलेतेहैं , तोषफरप ूँज
ीपषतवर्गकोएकसीमाके बादमज़दूरीको
बढ़ानाहीपडताहै क्योंषकमज़दूरवर्ग ऐसीषस्थषतमें कामकरने योग्यहालतमें अपनीश्रमशषिका
प न ु रुत्पादन नहीं कर सकता है। साथ ही यह समाज में असन्तोि को बढ़ाता है और एक षवस्फोटक
षस्थषतकीतरफ़जासकताहै।ऐसासामाषजकस क
टकुछअन्यप व ू गशतोंके प र ू ाहोने परराजनीषतक
स क
ीपषतवर्ग कोऐसीषस्थषतयोंमें मज़दूरीबढ़ानीपड
टमें िीतब्दीलहोसकताहै।इसषलएिीप ूँज
सकतीहै।
इ ग् ं लैड ि में मर्क का कान न ू ों (corn laws) का षववाद उन् नीसवीं सदी में इसी वजह से पैदा हुआ था। मर्क का कान न ू ों
के कारि इ ग् ं लैड ि का प ूँज ू ीपषत वगि सस् ते मर्क के का आयात नहीं कर पा रहा था। इ ग् ं लैड ि का ग्रामीि प ूँज ू ीपषत वग
षकसी भी क़ीमत पर उन करों व श ल् ु कों क़ी व् यवस् था को कायम रखना चाहता था जो षक आयाषतत मर्क के परलगाये जाते थे र्क योंषक इसी के कारि वह आयाषतत मर्क के से बार्जार में म क
ाबला कर पाता था। नतीजतन, मर्क क
क़ी क़ीमतें इ ग् ं लैड ि में ज़्यादा थीं और मर्क का प्रम ख
अनाज था षजसका उपभोग इ ग् ं लैड ि के मर्जद र ू करते थे। मह ग ं े
मर्क के के कारि मर्जद र ू ी पर बढ़ने का दबाव बना रहता था। अन् तत: औद्योषगक प ूँज ू ीपषत वगि क़ी बढ़ती राजनीषतक
शषि के कारि इ ग् ं लैड ि क़ी ब ज ु िआ
राज् यसत् ता ने इन मर्क का कान न ू ों को समाप् त कर षदया। इसक़ी वजह स
औद्योषगक प ूँज ू ीपषत वगि को फायदा पहु च ूँ ा हाला ष ं क ग्रामीि प ूँज ू ीपषत वगि के षलए प्रषतस् पद्धाि बढ़ गयी और उस
आगे चलकर उत् तरोत् तर मशीनीकरि व उत् पादक शषियों के षवकास के षलए बाध् य होना पडा। षनषित तौर पर,
इसके कारि षकसानों क़ी आबादी के एक षहस् से का सविहाराकरि हुआ और षकसानों के बीच षवभेदीकरि भी
बढ़ा। ये ऐषतहाषसक तौर पर प्रगषतशील पररवतिन थे और इन पर टेसू बहाना मार्क सि और ए ग ं ेल् स षनकृ ष्प टतम कोषट
क़ी टटप ूँष ु जया गलार्जत मानते थे। औसत मर्जद र ू ी पर बढ़ने के दबाव के कम होने के कारि प ूँज ू ीपषत वगि के षलए
अपने म न ु ाफे क़ी दर को बढ़ाना सम् भव हो गया।
इसषलए आम तौर पर औद्योषगक और षवत् तीय प ूँज ू ीपषत वगि व् यापक मेहनतकश आबादी के उपभोग में आन
वाले खाद्यान् नों क़ी क़ीमतों को बढ़ाने में अपना षहत नहीं देखता है , बषल्क उसे घटाने या षनयंत्रि में रखने में अपना
षहत देखता है। साथ ही वह अन् य कृ षि उत् पादों क़ी क़ीमतों को भी कम रखना चाहता है , जो षक उद्योग में होन
वाले उत् पादन में कच् चे माल के रूप में प्रयोग षकये जाते हैं। आज यषद षवत् तीय और औद्योषगक प ूँज ू ीपषत वग
लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था को अपना षनशाना बना रहा है और खेती के उत् पाद के व् यापार में बार्जार क़ी शषियों
को ख ल
ा हाथ देना चाहता है और राजक़ीय षवषनयमन और संरक्षि को समाप् त करना चाहता है , तो इसके पीछ
कृ िक प ूँज ू ीपषत वगि और औद्योषगक व षवत् तीय प ूँज ू ीपषत वगि का यह अन् तरषवरोध भी काम कर रहा है , हालांषक
यह द क ु मनाना अन् तरषवरोध नहीं है। यह अन् तरषवरोध अलग-अलग समय पर बेहद तीखा र्जरूर हो सकता है , मगर
यह उन अथों में शत्र त ु ाप ि ू ि अन् तरषवरोध नहीं बन सकता है षजन अथों में सविहारा वगि और प ूँज ू ीपषत वगि के बीच
का अन् त रषवरोध एक शत्र त ु ापूिि अन् तरषवरोध होता है।
इषतहास गवाह है षक औद्योषगक व षवत् तीय प ूँज ू ीपषत वगि द्वारा खेती के उत् पादन तथा उसके उत् पादों के व् यापार क
क्षेत्र के उदारीकरि, यानी उसे प ि ू ि रूप से बार्जार क़ी शषियों के हवाले षकये जाने से खेती के क्षेत्र में भी
इजारे दारीकरि बढ़ता है , बडी कारपोरे ट प ूँज ू ी तथा धनी षकसानों व कुलकों के वगि के एक दहस् से को उससे लाभ
ही होता है। षनषित तौर पर, इससे धनी व उच् च मध् यम षकसानों का भी एक छोटा षहस् सा बरबाद होता है या
सामाषजक-आषथिक पदान क्र
म में नीचे जाता है। लेषकन गरीब षकसानों और खेषतहर मर्जद र ू ों क़ी व् यापक आबादी
के षलए ऐसे उदारीकरि से पहले क़ी व् यवस् था भी कोई षवशेि लाभदायक नहीं होती है। इस प्रकार के उदारीकरि
का उसके षलए मुख् य असर यही होता है षक उसे ल ट ू ने और खसोटने वाला प्रम ख
वगि बदल जाता है। उसक़ी ल ट ू
पहले भी जारी होती है और बाद में भी और प ूँज ू ीवादी व् यवस् था के भीतर इसे खत् म षकया ही नहीं जा सकता है।
वह धनी षकसानों व कुलकों द्वारा खेषतहर उत् पादन व खेती के उत् पाद के व् यापार क़ी व् यवस् था में भी ल ट ु और
बरबाद हो रहा होता है और बडी कारपोरे ट प ूँज ू ी के इस क्षेत्र में प्रवेश के बाद भी उसक़ी षनयषत ल ट ु ना और
उजडना ही होता है।
इसषलए लािकारी मूल्य की व्यवस्था को बनाये रखने या उसे बढ़ाने या ए.पी.एम.सी. मषडियों की
व्यवस्थाकोज्योंकात्योंबरकराररखनेयानरखने कामसलाग्रामीणखेषतहरपूूँजीपषतवर्गऔरबडेइजारेदार कारपोरेट प ूँज
ीपषत वर्ग के बीच का षववाद है। इसमें ग्रामीण खेषतहरमज़दूरों, ग्रामीण ग़ैर -
खेषतहरमज़दूरों, ग़रीबवषनम्नम झ
ोले षकसानों, शहरीऔद्योषर्कवग़ैर -औद्योषर्कसवगहारावर्ग को
धनीषकसानोंवकुलकोंयाकारपोरेटप ूँज
ीपषतवर्गकासाथदेनेकीकोईआवश्यकतानहींहै।
उल् टे , जो तथाकषथत “मार्क सिवादी” (असल में कौमवादी और नरोदवादी) गरीब षकसानों व सविहारा वगि को इन
धनी षकसानों व कुलकों के प्रदशिन के म च ं ों पर इनका षपछलग् गू बनाने का काम कर रहे हैं , वे सम च ू े मर्जद र ू
आन् दोलन व कम् य ष ु नस् ट आन् दोलन को न क
सान पहु च ूँ ा रहे हैं। हमें मौज द ू ा कृ षि अध् यादेशों में से षवशेि तौर पर
तीसरे अध् यादेश यानी आवक यक वस् त ओ
ं से सम् बषन्धत अध् यादेश का सविहारा वगीय षवरोध करना चाषहए और
इसके षलए धनी षकसानों व कुलकों के म च ं पर जाकर उछल-कूद करने का कोई मतलब नहीं है। इनमें से षकसी
एक(यानीधनीषकसानों-कुलकोंयाकारपोरेटइजारेदारप ूँज
ीपषतवर्ग)के पीछे जानेकाअथगहैमज़दूर
वर्ग की राजनीषतक स्वत त्र ं ता को खोना जो षक ग़रीब षकसानों के षलए िी उतनी ही नुक़सानदेह है
क्योंषकवहअबमुख् य रूपसेउजरतीश्रमपरषनिगरहै , खेतीपरनहीं।
आज गरीब और षनम् न मध् यम षकसान वगि अपनी राजनीषतक चेतना क़ी कमी के कारि यषद अपने ही वगि षहतों क
षवपरीत धनी षकसानों और कुलकों के आन् दोलन में भीड बढ़ाने का काम कर रहा है , तो इसका अथि यह नहीं ह
षक मौज द ू ा षकसान आन् दोलन उसके वगि षहतों क़ी षहमायत कर रहा है या उसक़ी न म ु ाइन् दगी कर रहा है।
अगले उपशीििक क़ी ओर बढ़ने से पहले एक और पहलू पर बात करना यहाूँ प्रासंषगक होगा। जब भी इस प्रकार क
धनी षकसानों व कुलकों के आन् दोलन होते हैं तो शहरी मध् यवगि का एक षहस् सा इसे लेकर जज् ़बाती हो उठता है।
वह माूँग करता है षक जनता को भी सस् ता अनाज षमलता रहे और धनी षकसानों का लाभकारी म ल् ू य भी बढ़ता
रहे , इसे स ष ु नषक चत करने के षलए सरकार सषब्सिी देकर इस कायि को करे । यह प्रस् ताव दो कारिों से य ट ू ोषपयाई है।
पहली बात तो यह षक खेषतहर प ूँज ू ीपषत वगि और षवत् तीय-औद्योषगक प ूँज ू ीपषत वगि के बीच के अन् तरषवरोधों क
मद्देनर्जर यह सम् भव ही नहीं है। इस प्रकार के प्रस् तावों क़ी अव् यावहाररकता को स् वयं धनी षकसानों व कुलकों का
वगि भी समझता है। द स ू री बात यह है षक इन शहरी मध् यवगि के ब ष ु द्धजीषवयों के यह समझ में नहीं आता है षक धनी
षकसानों के षलए लाभकारी मूल् य बढ़ाने और साथ ही सस् ता भोजन म ह ु य ै ा कराते रहने के षलए षजस सषब्सिी को
देने क़ी वकालत ये कर रहे हैं , वह सषब्सिी आयेगी कहाूँ से ? र्जाषहर सी बात है , सरकार यह सषब्सिी अपन
सरकारी खर्जाने या राजस् व से ही देगी। इस राजस् व का मुख् य स्रोत हैं तमाम अप्रत् यक्ष कर। इन अप्रत् यक्ष करों को
म ख् ु यत: और म ल
त: व् यापक मेहनतकश जनता देती है। यषद ऐसी कोई सषब्सिी दी जाती है , तो घ म ु ा-षफराकर
इसक़ी क़ीमत आम मेहनतकश जनता से ही बढ़े हुए अप्रत् यक्ष करों व महूँगाई के रूप में वस ल
ी जायेगी। इन दो
कारिों से शहरी मध् यवगि के इन लोगों का यह प्रस् ताव य ट ू ोषपयाई और अव् यावहाररक है और इसे अमल में लाना
सम् भव ही नहीं है।
4.धनीषकसानवकुलकअचानक“मज़दूर -षकसानएकता” काषहमायतीक्योंहो
र्याहै ? पहली बात तो यह है षक षकसान दिशेष तौर पर प ूँज ू ीवादी समाज में कोई एक सजातीय या एकाक मी वगि नहीं होता
है। सबसे पहले यह प छ
ना पडता है षक हम षकस षकसान क़ी बात कर रहे हैं। र्क या हम उन 86 प्रषतशत गरीब व
पररषधगत षकसानों क़ी बात कर रहे हैं जो षक सवा हेर्क टेयर से भी कम र्जमीन के माषलक हैं और म ख् ु य रूप स
अपने जीषवकोपाजिन के षलए उजरती श्रम पर षनभिर हैं , या षफर उन षकसानों क़ी बात कर रहे हैं जो षक 4 हेर्क टेयर
से अषधक भ ष ू म के माषलक हैं और लाभकारी म ल् ू य का फायदा पाते हैं और अच् छा-खासा राजनीषतक असर और
दबदबा रखते हैं।
इसदबदबे कीश रु ु आतकै से ह ई? इस पर भी एक नर्जर िाल लेना उपयोगी होगा। 1960 में तथाकषथत हररत
क्राषन्त के बाद भारत में धनी षकसानों व कुलकों-फामिरों का एक षवचारिीय आकार का वगि अषस्तत् व में आया।
इसमें धनी काक तकार षकसान भी शाषमल थे। इस वगि के अषस्तत् व में आने के बाद 1970 के दशक में इसका
राजनीषतक प्रषतषनषधत् व भी प ूँज ू ीवादी राजनीषत में बढ़ने लगा। इसका अपनी माूँगों के लेकर दबाव क्रषमक प्रषक्रया
में बढ़ता गया। इसी दौर में चरि षसंह और देवी लाल जैसे नेता धनी षकसानों व कुलकों के इस वगि के षहतों का
प्रषतषनषधत् व कर रहे थे और उनक़ी उपषस्थषत को राष्प ट्रीय राजनीषतक पटल पर महस स ू षकया जाने लगा।
1980 के दशक क़ी शुरुआत तक खेती के क्षेत्र में सरकारी नीषत का ज़्यादा ध् यान खेती में साविजषनक षनवेश क
र्जररये अवसरंचनागत ढाूँचे को खडा करना था। इस समय तक षसंचाई व खेती के अन् य अवसंरचनागत ढाूँचों म
साविजषनक षनवेश द्वारा बेहतरी पर र्जोर था। वास् तव में , सम च ू े भारतीय प ूँज ू ीवादी षवकास के पथ में ही 1980 क
दशक क़ी श रु ु आत तक सरकारी षनवेश द्वारा प ूँज ू ीपषतयों के षलए एक अवसरंचना खडा करने पर र्जोर था। जब
एक दफा षनजी प ूँज ू ीपषत वगि उद्योग क़ी द ष ु नया में भी अपने पांवों पर खडा हो गया और एक अवसरंचनागत ढाूँचा
खडा हो गया तो षफर प ूँज ू ीवादी राज् यसत् ता ने एक क्रषमक प्रषक्रया में अथिव् यवस् था में उदारीकरि क़ी श रु ु आत कर
दी। खेतीके क्षेत्रमेंयहप्रषक्रयाथोडाअलर्तरीक़े सेघषटतह ई, हालांषकमूलतकग वहीथा।
हररत क्राषन्त के बाद धनी षकसानों व कुलकों-फामिरों के एक षवचारिीय आकार के वगि के षनमािि के बाद खेती
क़ी अवसरंचना में षनवेश क़ी बजाय सरकारी नीषत के के न् र में एक लाभकारी म ल् ू य को स ष ु नषित करने पर र्जोर बढ़
गया। 1980 के दशक के अन् त तक कृ षि उत् पाद क़ी सरकारी खरीद का लगभग 70 प्रषतशत षहस् सा हररयािा और
पंजाब से आने लगा था। इस नीषतगत पररवतिन के साथ खेती क़ी अवसरंचना में साविजषनक षनवेश में कमी आन
लगी और प र ू ा र्जोर लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था पर आ गया। उस समय खेती के क्षेत्र में प ूँज ू ी संचय भारतीय
प ूँज ू ीपषत वगि क़ी आवक यकता थी और इसके षलए इस व् यवस् था क़ी आवक यकता थी। जब यह नीषत पररवतिन हुआ
तो उसका सबसे नकारात् मक असर गरीब और षनम् न मध् यम षकसान पर पडा जो षक षसंचाई आषद के षलए मानसून
पर षनभिर थे। धनी षकसान व कुलक षसंचाई के षलए मानस न ू पर उस हद तक षनभिर नहीं थे और भ ज ू ल के दोहन पर
षनभिर कर सकते थे। ररयायती दरों पर षबजली ने इसे धनी षकसानों और कुलकों के षलए और भी स ग ु म बना षदया।
कृ षि में प ूँज ू ीवादी षवकास व प ूँज ू ी संचय और इसके षलए एक खेषतहर प ूँज ू ीपषत वगि का षवस् तार उस दौर म
भारतीय प ूँज ू ीवाद क़ी र्जरूरत थी और खेषतहर प ूँज ू ीपषत वगि और औद्योषगक-षवत् तीय प ूँज ू ीपषत वगि के बीच का यह
करार इसी र्जरूरत क़ी ही अषभव् यषि था।
आज के दौर में भारत के इजारे दार प ूँज ू ीपषत वगि क़ी र्जरूरतें बदल च क
़ी हैं। वैषिक संकट के दौर में भारतीय खेती
में भी संकट का एक दौर श रू
हुआ। इससंकटके दौरमेंिीदेशकीसमूचीषकसानआबादीके ऊपरके 4प्रषतशतधनीषकसानोंवकुलकोंकाज़्यादान क़
साननहींह आहै , बषल्कज़्यादातरमामलोंमें फ़ायदा
हीह आहै। वेअबतकलािकारीम ल् ू यके त त्र ं के ब त ू ेअपनेप ूँज
ीस च
यकोजारीरखनेमेंकामयाबरहे
हैं।इसस क
टके प र ू े दौरमें , यानी2004से 2016के बीचिी, िारतीयधनीषकसानोंवकुलकोंद्वारा
पावरषटलरोंकीख़रीदमेंतीनर् न ु ावट्रैक् ट रोंकीख़रीदमेंढाईर् न ु ाकीबढ़ोत्तरीह ईहै।दूसरेशब्दोंमें ,
िारतके ग्रामीणखेषतहरप ूँज
ीपषतवर्ग द्वाराप ूँज
ीस च
यकमोबेशस्वस्थरूपसे जारीरहाहै औरखेती
में षनवेशकीउनकीदरऔरक्षमतामें कुलषमलाकरबढ़ोत्तरीहीह ईहै।षफर कृ षि के स क
ट के कारि
आत् महत् या करने वाले षकसान कौन हैं ? ये ज् ़यादातर गरीब व पट्टे पर र्जमीन लेकर खेती करने वाले खेषतहर मर्जद र ू
व अद्धिसविहारा हैं , जोषक हमेशा ही ऋि तले दबे रहते हैं।
आजजबलािकारीम ल् ू यवसरकारीमषडियोंकीव्यवस्थाइसधनीषकसानवकुलकवर्ग से छीनी
जारहीहै , तोवहअचानक“मज़दूर -षकसान एकता” कासमथगकबनर्याहै ! आइयेदेखतेहैंषकअिी
हालहीमें औरपहले िीयहधनीषकसानवकुलकवर्ग खेषतहरमज़दूरोंऔरग़रीबषकसानोंके साथ
क्याबतागवकरतारहाहै।
हाल ही में लॉकिाउन के शुरू होने के बाद पंजाब और हररयािा में प्रवासी खेषतहर मर्जद र ू ों क़ी संख् या में बेहद
कमी आ गयी थी। इसके कारि खेषतहर मर्जद र ू ों द्वारा श्रमशषि क़ी आप ष ू ति में बेहद कमी आ गयी। इस आप ष ू ति म
कमी आने के कारि नैसषगिक तौर पर खेषतहर मर्जद र ू ों क़ी मर्जद र ू ी में बढ़ोत् तरी होने लगी। ऐसे में , पंजाबऔर
हररयाणाके कईर्ाूँवोंमेंधनीषकसानों, उच्चमध्यमषकसानोंवकुलकोंनेबाक़ायदाअपनीपंचायतों,
खापों व सिाओ ं में मत िालकर अषधकतम मज़दूरी तय की। षकसी िी षकसान को इससे ज़्यादा
मज़दूरीदेने कीइजाज़तनहींथीऔरनहीर्ाूँवके षकसीखेतमज़दूरकोकहींऔरजाकरकामकरने
कीइजाज़तथी।अर्रवहजाताहै तोउसकाबषहष्कारषकयाजायेर्ा!यानी, र्ाूँवके खेतमज़दूरोंको
धनीषकसानोंद्वारातयमज़दूरीपरमज़दूरीकरने के षलएबाध्यषकयार्या।उससमयमज़दूर -षकसान
एकताकानाराधनीषकसानोंवकुलकोंके संर्ठनोंकोयादनहींआयाथा।
धनी षकसानों व कुलकों ने खेत मर्जद र ू ों के षलए न् य न ू तम मर्जद र ू ी व अन् य श्रम अषधकारों को स ष ु नषित करने क़ी
माूँगों का हमेशा षवरोध षकया है। श्रम कान न ू एक प ूँज ू ीवादी व् यवस् था में कम-से - कम औपचाररक तौर पर
राज् यसत् ता द्वारा षदया जाने वाला एक प्रकार का संरक्षि है , ठीक उसी प्रकार जैसे लाभकारी म ल् ू य धनी षकसानों व
कुलकों को राज् यसत् ता द्वारा षदया जाने वाला एक संरक्षि है , हालांषक ये दो अलग प्रकार के संरक्षि हैं। धनी
षकसानवकुलकअपने षलएतोराज्यसत्तासे संरक्षणचाहते हैं , लेषकनग़रीबषकसानवखेतमज़दूर
यषदअपनेषलएश्रमक़ानूनोंके रूपमेंसंरक्षणकीमाूँर्करतेहैं , तोउसकाषवरोधकरतेहैं।क्यामौजूदा
षकसानआन्दोलनचलारहे तमामषकसानसंर्ठनइसमाूँर्कोस्वीकारकरेंर्े षकसिीखेतमज़दूरों
को िी क़ानूनी तौर पर साप्ताषहक छुट्टी, आठ घडटे का कायगषदवस, न्यूनतम मज़दूरी, दोर्ुनी दर से
ओवरटाइमकािुर्तानआषदप्राप्तहो?क्यामौजूदाआन्दोलनकीमाूँर्ोंमें वे इनमाूँर्ोंकोशाषमल
करेंर्ेऔरइन्हेंप्राथषमकतादेंर्े ? नहीं!
तो षफर इन धनी षकसानों व कुलकों के मंचों से आज अचानक जो “मर्जद र ू -षकसान एकता” का नारा उठाया जा
रहा है , उसका मतलब र्क या है ? कुछ भी नहीं! यह धनी षकसानों और कुलकों क़ी माूँगों के षलए गरीब षकसानों वखेत मर्जद र ू ों को उनके ही वगि षहत के षखलाफ इकट्ठा करना है। यहिीजर्जाषहरहैषकमौज द ू ाआन्दोलनकी
तमामरैषलयोंवप्रदशगनोंमें स्वय ं धनीषकसानवकुलकतोकमहीजाते हैं , लेषकनवे ग़रीब, षनम्न
मध्यमषकसानोंवखेतमज़दूरोंकोिेजने काप्रबन्धकरदेते हैं।यानीउनकीमाूँर्ोंके षलएचलरहे
आन्दोलनमें िीलाठीखाने औरजेलजाने काकामग़रीब, षनम्नमध्यमषकसानोंवखेतमज़दूरोंको
सौंपषदयाजाताहै।
एक ओर र्ाूँवों में धनी षकसानों, स द ू खोरों, आढ़षतयों पर अपनी षनिगरता के कारण और दूसरी ओर
अपनीस्वत त्र ं वर्ग चेतनाववर्ग स र् ं ठनके अिावमें र्ाूँवके सवगहाराऔरअर्द्गसवगहारातथाग़रीबव
षनम्नमध्यमषकसानधनीषकसानोंऔरकुलकोंकीउनमाूँर्ोंके षलएचलरहेआन्दोलनमेंजातेिीहैं ,
जोषकउनके षख़लाफ़जातेहैं। कुछ को यह गलतफहमी भी होती है षक यषद लाभकारी म ल् ू य बढ़ेगा तो उन् हें भी
अपनी उपज का बेहतर दाम षमलेगा या बेहतर मर्जद र ू ी षमलेगी, हाला ष ं क आनुभषवक तौर पर देखें तो ऐसा कोई
‘षट्रकल िाउन’ होता नहीं है। यह भी नवउदारवादी ‘षट्रकल िाउन’ षसद्धान् त का एक कुलक संस् करि मात्र ही है।
ऐसे में ज़रूरत यह है षक इन ग़रीब व षनम्न मध्यम षकसानों तथा खेत मज़दूरों को धनी षकसानों व
कुलकोंके संर्ठनोंके राजनीषतकनेतृत्वऔरप्रिावसेअलर्षकयाजाय।उन्हेंउनके वर्गषहतोंके प्रषत
सचेतबनानाऔरउनके अलर्वर्ीयसंर्ठनोंकाषनमागणआजर्ाूँवोंमें क्राषन्तकारीसंर्ठनके कायग
कीएकबुषनयादीज़रूरतहै।उनकीमूलमाूँर्रोज़र्ारकीहैऔरउन्हेंरोज़र्ारर्ारडटीके षलएहीलडना
चाषहए।साथही, खेतमज़दूरोंकोन्यूनतममज़दूरी, साप्ताषहकछुट्टी, आठघडटे के कायगषदवस, दोर्ुनी
दरसे ओवरटाइमके िुर्तान, ई.एस.आई.-पी.एफ.के अषधकारोंके षलएसंघिग करनाचाषहए। गाूँव क
गरीबों क़ी तात् काषलक माूँगें आज यही बनती हैं।
न तो उनमें छोटी जोत क़ी षकसानी को बचाने का नारा षदया जा सकता है (जो षक उनका ख न ू ही च स ू ती रहती ह
और देती कुछ नहीं है , बस लेती जाती है) ; यह एक प्रषतषक्रयावादी रूमानी नारा होगा। जैसा षक लेषनन ने कहा था,
कम् य ष ु नस् टों को गरीब षकसानों को सच बताना चाषहए न षक उन् हें षकसी भ्रम में जीने का आदी बनाना चाषहए। चाह
कुछ भी कर षलया जाय, प ूँज ू ीवादी व् यवस् था के रहते छोटी जोत क़ी खेती का कोई भषवष्प य नहीं है। कुछ आंकडों क
आइने में इस सच् चाई को देखते हैं।
2001 से 2011 के बीच ही खेषतहर मज़दूरों की संख् य ा में िारत में 35 प्रषतशत की बढ़ोत्तरी ह ई। ये
बढ़ोत्तरीमुख्यत:ग़रीबवषनम्नमध्यमषकसानोंके तबाहहोनेसेह ई, जोषकसतत ् ऋणग्रस्ततामेंजीते
हैं। आत् महत् याओ ं क़ी दर भी इन् हीं गरीब षकसानों में सबसे ज् ़यादा है। 2001से 2011के बीचषकसानोंकी
संख्यामेंकरीब90लाखकीकमीआईथी। षनषित तौर पर, यह उसके बाद और भी तेर्जी से बढ़ी है र्क योंषक
कृ षि संकट उसके बाद के दौर में गहराया ही है। 2011में26.3करोडलोर्खेतीमेंलर्ेथे , षजनमेंसेआधेसे
िीज़्यादाखेषतहरमज़दूरथे।षकसानोंकीतादादइसीदशकमें 12.7करोडसे घटकर11.8करोडरह
र्यीथी। इस षकसान आबादी में भी 90 प्रषतशत पररषधगत, बेहद छोटे या छोटे षकसान थे , षजनक़ी आजीषवका
का म ख् ु य आधार खेती नहीं रह गया है , बषल्क उजरती श्रम है।
यानी, मध्यम, उच्चमध्यमवधनीषकसानोंवकुलकोंकीआबादीआजमुषश्कलसेएकसेिेढ़करोड
है , औरयहीआबादीहै जोषकखेषतहरमज़दूरोंकािूस् व ामीके तौरपर, सूदखोरके तौरपर, पूूँजीवादीफामगरके तौरपरऔरव्यापारीऔरआढ़षतये के तौरपरसबसे ज़्यादाशोिणऔरउत्पीडनकरतीहै
और उनकी मज़दूरी और काम के हालात को ब र ु ीसे ब र ु ी षस्थषतमें बनाये रखने के षलए हर सम्िव
कोषशशकरतीहै।और अब जबषक कारपोरे ट प ूँज ू ी खेती के क्षेत्र में घ स ु रही है और ये ग्रामीि प ूँज ू ीपषत वगि उसस
प्रषतस् पद्धाि में तबाह होने क़ी सम् भावना से भयाक्रान् त है , तो सहसा वह “मर्जद र ू -षकसान एकता” का राग गाने लगा
है ! इस पर सविहारा वगि और गरीब षकसानों का जवाब होना चाषहए षक लाभकारी म ल् ू य क़ी लडाई षकसी भी रूप
में उसके हक में नहीं ठहरती है और उसक़ी म ल
माूँग है रोर्जगार गारड टी, खेत मर्जद र ू ों के षलए सभी श्रम अषधकार
और धनी षकसानों, व् यापाररयों, आढ़षतयों के कर्जि से प ि ू ि म ष ु ि।
5.तीनकृषिअध्यादेशोंके प्रावधानोंमेंमज़दूरोंऔरमेहनतकशोंके षख़लाफ़क्या
है ?
तीन कृ षि अध् यादेशों में जो प्रावधान षवषशष्प ट रूप में मर्जद र ू ों के षवरुद्ध जाता है वह है आवक यक वस् त ओ
ं के कान न ू
में पररवतिन। इस कान न ू के र्जररये उन तमाम ब ष ु नयादी वस् तुओ ं क़ी जमाखोरी, कालाबार्जारी और उनक़ी क़ीमतों म
कृ षत्रम रूप से बढ़ोत् तरी करने क़ी व् यापाररक प ूँज ू ी और दलाल षबचौषलये वगि क़ी क्षमता बढ़ेगी। व्यापाररक
पूूँजीपषतवर्गऔरसाथहीधनीषकसानवकुलकवर्गइनवस्त ओ
ं कीजमाखोरीकरकृषत्रमअिावकी
षस्थषतपैदाकरेंर्ेऔरक़ीमतोंकोइसतरीक़े सेबढ़ाकरअषधकमुनाफ़ाकमासकतेहैं।
यह तीसरा अध् यादेश मर्जद र ू ों और मेहनतकशों के सीधे षखलाफ जाता है और मर्जद र ू ों और मेहनतकशों को अपन
षवरोध का षनशाना म ख् ु यत: इस अध् यादेश पर रखना चाषहए। साथ ही, सरकार द्वारा साविजषनक षवतरि प्रिाली
को राज् य सरकारों के षर्जम् मे िालने के बहाने समाप् त करने क़ी जारी साषर्जश का आम मेहनतकश आबादी को
षवरोध करना चाषहए।
कुछ लोगों का दावा है षक यषद ए.पी.एम.सी. मषडियों में व् यापार बन् द हो गया तो षफर इनमें काम करने वाल
मर्जद र ू ों क़ी नौकररयाूँ चली जायेंगी। तात्काषलकतौरपरऐसाहोिीसकताहै , लेषकनयषदए.पी.एम.सी.
मषडियोंमेंव्यापारनहींहोर्ा, तोइसकायहअथगक़तईनहींहैषकअनाजवखेतीके अन्यउत्पादोंका
व्यापारहीनहींहोर्ा।यहव्यापारजारीरहेर्ाऔरउसमें मज़दूरोंकीज़रूरतिीबनीरहेर्ी।बसअन्तर
यहहोर्ाषकअबयहकायगशषिए.पी.एम.सी.मषडियोंमें ठे केदारोंवआढ़षतयोंके मातहतकामनहीं
करेर्ी, बषल्कबडीकारपोरेटप ूँज
ीके अनाजप्राषिवख़रीदकीव्यवस्थामेंकामकरेर्ी।
र्क या बडी कारपोरे ट प ूँज ू ी के इस क्षेत्र में प्रवेश के साथ इसमें रोर्जगार घटेंग ? े यह भी कई कारकों पर षनभिर करता है।
च ष ं ू क आम तौर पर बडी कारे पोरे ट प ूँज ू ी के षकसी भी क्षेत्र में प्रवेश के साथ प ूँज ू ी का आवयषवक स घ ं टन बढ़ता ह
और प्रषत इकाई रोर्जगार घटता है , इसषलए कम-से - कम तात् काषलक तौर पर रोर्जगार में कमी आ भी सकती है।
लेषकन अगर उत् पादन और व् यापार षवस् ताररत होते हैं , तो वह बढ़ भी सकता है। षसफ़ग इसआधारपरषकइस
क्षेत्र में बडी कारपोरेट पूूँजी आयेर्ी और अपेक्षाकृत छोटी पूूँजी प्रषतस्पर्द्ाग में पराषजत होर्ी, इसका
षवरोधकरने काकोईअथग नहींहै।दूसरीबात, पूूँजीवादीव्यवस्थाके रहते इसके अलावाषकसीऔरपररणामकीअपेक्षाकरनाऔरउसके प्रषतलोर्ोंमेंआशापैदाकरनाप्रषतषक्रयावादीऔररूमानीवादी
अवषस्थषतहै।
मर्जेदार बात यह है षक जो लोग ए.पी.एम.सी. मषडियों के अप्रास ष ं गक होने के साथ यहाूँ काम करने वाले मर्जद र ू ों
क़ी नौकररयों के जाने क़ी श क
ा से पेट में मरोड उठाए बैठे हैं , वे धनी षकसानों और कुलकों के म च
पर जाकर ‘ता-
ता थैया’ कर रहे हैं , जबषक ये धनी षकसान और कुलक अपने म च
ों पर इन मषडियों को बचाए जाने को लेकर कोई
खास शोरग ल
नहीं कर रहे हैं , बदल्क यह कह रहे हैं दक यदि इन मदण्डयों के बाहर व् यापार क्षेत्रों में व् यापार की
इजाज़त िी जाती है , तो दकसानों को लाभकारी म ल् ू य का कान न ू ी हक दिया जाय, दजससे दक कोई भी ख़रीिार चाह
कहीं भी कृ दष उत् पाि ख़रीिे , लाभकारी म ल् ू य पर ही ख़रीिे। यानी इन धनी षकसानों और कुलकों को
ए.पी.एम.सी.मषडियोंमें कामकरने वालीमज़दूरआबादीकीनौकररयोंकीषचन्तानहींहै।उन्हें के वल
लािकारीमूल्यकीषचन्ताहै।
हमें इनमज़दूरोंके षलएिीरोज़र्ारर्ारडटीऔरषनयषमतीकरणकीमाूँर्करनीचाषहए। ए.पी.एम.सी.
मषडियों और लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था को बचाना अपने आप में हमारे षलए कोई कायिभार नहीं है। हम इन
मर्जद र ू ों के षलए भी सरकार क़ी ओर से रोर्जगार गारड टी क़ी माूँग करें ग , े न षक धनी षकसानों व कुलकों के षलए
लाभकारी मूल् य के तंत्र को बचाने क़ी माूँग , जो षक इन मर्जद र ू ों के ही षखलाफ जाती है। और यषद धनी षकसान,
कुलक, स द ू खोर और आढ़षतये ए.पी.एम.सी. मषडियों को बचाने क़ी बात करते हैं , तो हमें उनसे इसके समथिन क़ी
प व ू िशति के तौर पर यह माूँग करनी चाषहए षक इन मषडियों में काम करने वाले सभी मर्जद र ू ों को षनयषमत षकया
जाय, उन् हें सभी श्रम अषधकार षदये जायें , जैसे षक 8 घड टे का कायिषदवस, न् य न ू तम मर्जद र ू ी, इत् याषद। र्जाषहर है , य
आढ़षतये , षबचौषलये और स द ू खोर (जो अर्क सर स् वयं धनी षकसान या कुलक भी होते हैं ! ) इन मर्जद र ू ों क़ी इन माूँगों
क़ी कोई चचाि नहीं कर रहे हैं।
इसी से यह प्रक न भी उठता है षक र्क या धनी षकसानों व कुलकों के आन् दोलन के मंच पर जाकर हम इन अध् यादेशों
के उन प्रावधानों का कोई अथिप ि ू ि षवरोध कर सकते हैं , जो षक व् यापक आम मेहनतकश जनता के षखलाफ जात
हैं ?
6. क्या धनी षकसानों-कुलकों के आन्दोलन के मंच से कृषि अध्यादेशों के
जनषवरोधीप्रावधानोंकाषवरोधकरनासम्िवहै ?
इसकासीधाजवाबहै:नहीं!ऐसीकल्पनापालनािीम ख
गताकीपराकाष्ठाहै। जो आन् दोलन प र ू ी तरह स
लाभकारी म ल् ू य क़ी व् यवस् था को कायम रखने पर के षन्रत है , जो आन् दोलन प र ू ी तरह से धनी षकसानों व कुलकों
के राजनीषतक नेत त् ृ व क़ी षगरफ़्त में है और जहाूँ इस म ल
माूँग से इतर जाने का कोई षवशेि स् पेस या स् कोप ही नहीं
है , वहाूँ आप उस असली प्रावधान के षखलाफ या तो बोल ही नहीं सकें गे या षफर कुछ बोल पाये भी तो आपक़ी
बात ‘लाभकारी म ल् ू य बचाओ!’ के शोर में कहीं स न ु ाई भी नहीं पडेगी।दूसरी बात, यषद सवगहारा शषियाूँ इन म च
ों पर जाती िी हैं तो उन्हें लािकारी म ल् ू य के षवरुर्द् िी
बोलना ही होर्ा, जो षक सम्िव ही नहीं है। यषद कोई सवगहारा स र् ं ठन इन म च
ों पर जाता है और
लािकारीम ल् ू यकीमाूँर्के प्रषतषक्रयावादीचररत्रपरचुप्पीसाधे रहताहै , तोयहसबसे घषटयाषक़स्म
का अवसरवाद और दषक्षणपन्थी िटकाव होर्ा। यह एक सस्ती लोकरंजकता होर्ी जो षक कुछ
सैर्द्ाषन्तकरूपसेकमज़ोरऔरअवसरवादीकम्य ष ु नस्टोंकोकहींिीिीडदेखनेपरउसमेंकूदपडनेके
षलएप्रेररतकरतीरहतीहै।
षवशेितौरपर, जोकम्युषनस्टक्राषन्तकारीमानते हैं षकिारतएकप ूँज
ीवादीदेशहै औरसमाजवादी
क्राषन्तकीम ष ं ज़लमें है , उन्हें तोक़तईऐसे म च
ोंपरषपछलग्र् ू बनने काषवरोधकरनाचाषहए।यहाूँ तक
षकनवजनवादीक्राषन्तकीम ष ं ज़लमानने वाले कम्युषनस्टक्राषन्तकाररयोंकािीऐसे म च
परजाने का
कोईअथगनहींबनताहै।लेषकनजोसमाजवादीक्राषन्तमानतेहैंउनके षलएतोयहएक़दमहीबेतुकाहै।
सच् चाई यह है षक इन मंचों पर न तो धनी षकसान व कुलक नेता ए.पी.एम.सी. मषडियों को अलग से बचाने क़ी
माूँग कर रहे हैं और न ही उनका कोई षवशेि र्जोर आवक यक वस् त ओ
ं क़ी स् टॉषकंग के षवषनयमन को खत् म करने स
है। ए.पी.एम.सी. मषडियों को बचाने क़ी माूँग षसफि इस नर्जररये से है षक वह लाभकारी म ल् ू य को स ष ु नषित करतीं ह
और यषद सरकार लाभकारी म ल् ू य का कान न ू बनाने को तैयार हो तो वे इन ए.पी.एम.सी. मषडियों को बचाने क़ी
माूँग को षतलांजषल देने को भी तैयार हैं , जैसा षक अषखल भारतीय षकसान सभा के षवजू कृ ष्प िन ने साफ शब् दों म
बता षदया! यानीयषदकोईिीषनजीख़रीदारकहींपरिीखेतीउत्पादकीख़रीदकम-से - कमलािकारी
मूल्यपरकरे , तोए.पी.एम.सी.मषडियाूँ िाडमें जायें ! साथहीये धनीषकसानऔरकुलकआवश्यक
वस्तुओ ं सम्बन्धीक़ानूनमेंबदलावपरिीज़्यादाज़ोरसेनहींबोलरहेहैं , क्योंषकउससेइन्हेंकोईख़ास
नुक़साननहींहै , उल्टेफ़ायदाज़रूरहोसकताहै।
ऐसे मंच पर जहाूँ इन धनी षकसानों और कुलकों क़ी माूँगों का ही शोर मचा हुआ हो, जो प र ू ी तरह उनके नेत त् ृ व म
हों और जहाूँ भीड भी उनक़ी व उनके षपछलग् ग ओ
ं क़ी हो, वहाूँ पर कोई भी सविहारा शषि न तो आम मेहनतकश
आबादी को प्रभाषवत करने वाले प्रावधानों का कोई प्रभावी व अथिप ि ू ि षवरोध कर सकती है और न ही वह गरीब
षकसानों, षनम् न मध् यम षकसानों तथा खेत मर्जद र ू ों को धनी षकसानों व कुलकों के राजनीषतक नेत त् ृ व से आर्जाद
करा सकती है। जोऐसीबातें बोलकरइनमंचोंपरजाकरधनीषकसानोंवकुलकोंके सामने साष्टांर्
दडिवत हो रहा है , वह न के वल एक षनकृष्ट कोषट का अवसरवादी, लोकरंजकतावादी और
दषक्षणपन्थीिटकावकाषशकारहैबषल्कवहएकऔरियंकरअपराधकररहाहै।
यह अपराध यह है षक ऐसे तथाकषथत “माक्सगवादी” (असल में क़ौमवादी और नरोदवादी) ग़रीब
षकसानोंऔरमज़दूरवर्ग कोिीग्रामीणवखेषतहरबुज गआ
ज़ीकाषपछलग्र्ू बनाने काकामकरते हैं।
ऐसे कुछअनपढ़“माक्सगवादी” आजकलिीइनधनीषकसानोंवकुलकोंके प्रदशगनोंमें षकसानोंकी
वेशिूिा धरे पह ूँच रहे हैं और वहाूँ पर उनके राजनीषतक नेतृत्व की पूंछ में कंघी करने में व्यस्त हैं।
अफसोस क़ी बात यह है षक ये अनपढ़ “मार्क सिवादी” पहले इन मंचों पर जाने और धनी षकसानों व कुलकों का
षपछलग् गू बनने को सरासर गलत मानते थे। लेषकन हाल ही में ये बुडिवादी राष्ट्रवाद और साथ ही
त्रॉत्स् क
ीपन्थ के षशकार हो र्ये हैं। बहसों से पलायन और राजनीषतक-षवचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण ये ट्रॉट-ब ड ु िवादी अब लोकरंजकतावाद और षकसानवाद की ओर एक क्रषमक प्रषक्रया में
स क्र
मणकररहे हैं षजसकीरफ़्तारषदन-पर-षदनबढ़तीजारहीहै।ब ड ु िवादीराष्ट्रवादसे नरोदवादऔर
षकसानवाद की तरफ़ एक सीधा राजमार्ग जाता है। अगर ये अनपढ़ “मार्क सिवादी” व ट्रॉट-ब ड ु िवादी
लोकरंजकतावाद, षकसानवाद और नरोदवाद क़ी ओर कदम बढ़ा रहे हैं तो इसमें कोई ताज् ज ब ु क़ी बात भी नहीं है।
हरिटकावकीअपनीएकस्वत त्र ं र्षतहोतीहै औरएकदफ़ापैदाहोर्यातोवहअपने वाहककी
इच्छासे स्वत त्र ं उसे उसके राजनीषतकषनवागणपरपह च
ादेताहै।ऐसे िटकावोंकोपैबन्दसाज़ीकरके
चोरीसेठीककरलेनेकाकोईरास्तानहींहोताहै। ऐसी ताकतों को आज बेनकाब करने क़ी बेहद र्जरूरत ह
र्क योंषक ये सविहारा वगीय आन् दोलन क़ी राजनीषतक स् वत त्र ं ता को तबाह कर रहे हैं और उसे अपने वगिशत्र ओ
ं क़ी
राजनीषत का प छ
ल् ला बना रहे हैं। ऐसी ख़तरनाक कायगषदशाओ ं को पराषजत करके और कुचलकर ही
मज़दूर वर्ग की क्राषन्तकारी राजनीषत आर्े बढ़ती है और आज िी इन कायगषदशाओ ं की षनमगम
आलोचनापेशकरनाऔरउन्हें क्राषन्तकारीखेमे औरमज़दूरवर्ग वग़रीबषकसानोंमें बेनक़ाबकरना
एकअहमकायगिारहै।
ये ट्रॉट-बुडिवादीशषियाूँ अिीएकशमगनाकषस्थषतमें फंसर्यीहैं।अबये सीधे लािकारीमूल्यका
समथगनतोकरनहींसकतीहैंक्योंषकषपछलेपन्रहसालसेपंजाबमेंयेइसीके षख़लाफ़बोलतीआयी
हैंऔरअर्रअबयेसमथगनकरेंर्ीतोइनकाबडामखौलबनेर्ा। लेषकनसाथहीयेइनधनीषकसानोंव
कुलकोंके आन्दोलनके मंचपरलािकारीमूल्यकीमाूँर्के प्रषतषक्रयावादीचररत्रपरिीनहींबोल
सकतीहैं , क्योंषकषफरइनकीहीक़ौमकीग्रामीणब ज
गआ
ज़ी(जोषकपूरे पूूँजीपषतवर्ग में छोटीया
मंझोलीबुज गआ
ज़ीकाहीस्थानरखतीहैऔरइनट्रॉट-बुडिवाषदयोंके अनुसार“दषमत” है ! )इन्हेंअपने
मंचसेपयागप् त सेवा-सत्कारकरनेके बादउठाकरनीचेफें कदेर्ी!
इसषलए इन् होंने धनी षकसानों व कुलकों के इस मंच पर प छ ु ल् ले क़ी भ ष ू मका में जगह पाने का एक नया तरीका
षनकाला है। इन्होंने इनकृषिअध्यादेशोंकापूरामसलाप्रान्तोंके संघीयअषधकारोंपरहमलेकामसला
बनाषदयाहै।यानीइनतीनकृषिअध्यादेशोंकाषवरोधकरने में ये संघवादपरहोरहे हमले परज़्यादा
बोलरहे हैं।तोआइये देखते हैं षकसंघवादपरऔरप्रान्तोंके संघीयअषधकारोंपरसवगहारावर्ग का
नज़ररयाक्याहोनाचाषहए।
7.क्यामज़दूरवर्ग औरउसकाषहरावलप्रान्तोंके संघीयअषधकारोंकाषनरपेक्ष
समथगनकरसकतेहैं ?
इस सवाल का िीसीधाजवाब है: नहीं!! मज़दूर वर्ग प्रान्तों के स घ ं ीय अषधकारों और स घ ं वाद का
समथगनषबनाशतग नहींकरताहै औरनहीकरसकताहै।स घ ं वादऔरप्रान्तोंके स घ ं ीयअषधकारोंका
प ूँज
ीवादीव्यवस्थाके मातहतषनरपेक्षसमथगनकरनाक्षेत्रीयप ूँज
ीपषतवर्ग कीमाूँर्है , नषकसवगहारा
वर्गकीमाूँर्।सवगहारावर्गप ूँज
ीवादीव्यवस्थाके मातहतषनरपेक्षतौरपरएकऐसेके न्रीयतावादकीमाूँर्करताहैजो
षकजनवादीहोतानाशाहानानहीं। यषद ऐसा के न् रीयतावाद मौज द ू नहीं होता है जो षक सच् चे मायने में जनवादी
हो, यानी षजसमें हर प्रान् त को प ि ू ित: स् थानीय महत् व के मसलों पर षनििय लेने का अषधकार हो, तो भी सविहारा
वगि संघवाद क़ी माूँग नहीं करता है , बषल्क उस के न् रीयता को जनवादी बनाने के षलए लडता है। प ूँज ू ीवादी
व् यवस् था में अपने आप में स घ ं वाद क़ी माूँग करना सविहारा वगि के बीच दीवारें खडी करता है , आम तौर पर
प ूँज ू ीवाद के षवकास को अवरुद्ध करता है और प्रषतषक्रयावादी क्षेत्रीय प ूँज ू ीपषत वगि के षहतों का प्रषतषनषधत् व करता
है। यह लेषनन द्वारा संघवाद पर स् थाषपत सही सविहारा अवषस्थषत है। समाजवादी व् यवस् था आने पर भी संघवाद
सविहारा वगि का सकारात् मक प्रस् ताव नहीं होता है , बषल्क एक स क्र
मिशील षस्थषत में उठाया गया मध् यवती कदम
होता है बशते षक सभी संघटक कौमें य ष ू नयन के षलए तैयार न हों, और यषद यह स घ ं ात् मकता समाजवाद में बची
भी रहती है , तो उसका स् वरूप प ूँज ू ीवाद में क्षेत्रीय प ूँज ू ीपषत वगि क़ी स् वायत् तता को स ष ु नषित करने वाल
प्रषतषक्रयावादी संघवाद से षबल् कुल अलग होता है और उसका चररत्र अषधक से अषधक जनवादी के न् रीयता का
होता जाता है , जैसा षक सोषवयत संघ में हुआ भी था।
ल ब् ु बेलुबाबयहषकपूूँजीवादीव्यवस्थाके मातहतसवगहारावर्ग संघीयढाूँचे के षलएअपने पेटमें ददग
नहींपैदाकरताहैऔरनहीअलर्-अलर्मुद्दोंपरवहप्रान्तोंके संघीयअषधकारोंके उल्लंघनकाषबना
शतग षवरोध करता है। ऐसे में , प्रान्तों के संघीय अषधकारों के प्रषत आज यानीपूूँजीवादी व्यवस्था के
मातहतमज़दूरवर्गकाक्राषन्तकारीरवैयाक्याहोनाचाषहए?
हमें के वल उन षस्थषतयों में प्रान्तों के संघीय अषधकारों के उल्ल घ ं न का षवरोध करना चाषहए षजन
षस्थषतयों में ये उल्ल घ ं न मज़दूर वर्ग व अर्द्गसवगहारा वर्ग के वर्ीय षहतों को न क़
सान पह ूँचाते हैं। इन
मामलों में िी हमारे षवरोध का प्रस्थान-षबन्दु संघवाद की रक्षा नहीं होती है बषल्क सवगहारा वर्ग व
अर्द्गसवगहारा वर्ग के षहतों की षहफ़ाज़त होती है। ऐसे मौक़ों पर िी हम क्षेत्रीय मंझोली व छोटी
बुज गआ
ज़ीद्वाराउसके संघीयअषधकारोंकोछीने जाने के शोरमें खंजडीबजाने काकामनहींकरते हैं ,
जैसाषकआजपंजाबमें कुछट्रॉट-बुडिवादी, राष्ट्रवादीऔरअषस्मतावादीतथाकषथत“माक्सगवादी”
कररहेहैं। हम सकारात् मक तौर पर उन मर्जद र ू वगीय षहतों व अद्धिसविहारावगीय षहतों पर हमले क़ी बात करते ह
और इसके षलए संघवाद के बुज िआ
नारे के छाते क़ी नीचे जाने क़ी हमें कोई आवक यकता नहीं है।
ल ब् ु बेलुबाब यह षक प्रान्तों के संघीय अषधकारों और संघवाद का उल्लंघन हमारे षलए कोई षनरपेक्ष
प्रश्ननहींहै , बषल्कइसप्रश्नकोहममज़दूरवर्ग औरअर्द्गसवगहारावर्ग के षहतोंकीसेवाके मातहत
रखतेहैं। यषद कहीं पर कोई राज् य सरकार राज् य स च ू ी में आने वाले षकसी मसले पर व् यापक मर्जद र ू व मेहनतकश
जनता के षहतों के षखलाफ कोई कान न ू बनाये और कोई के न् र सरकार ब ज ु िआ
र्जी के आपसी अन् तरषवरोध के चलत
उसे रद्द कर दे तो र्क या हम सविहारा क्राषन्तकारी उसका षवरोध करें ग ? े आइये इसे एक षमसाल से समझते हैं , ताषक
इन कौमवादी ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों क़ी आूँखों पर पडा पदाि हट सके , हालांषक ऐसी उम् मीद करना भी आकाश-कुसुम
क़ी अषभलािा करने के समान है र्क योंषक इन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों के नेत त् ृ व क़ी म ख
िता कई मामलों में अषद्वतीय और
अभ त ू प व ू ि है। लेषकन षफर भी इस षमसाल पर गौर करने से प्रान् तों के संघीय अषधकार के प्रक न पर सविहारा वगीय
षस्थषत काफ़ी हद तक ख द ु ही साफ हो जाती है।उत् तर प्रदेश के फासीवादी म ख् ु यम त्र ं ी योगी आषदत् यनाथ ने अभी ‘उत् तर प्रदेश षवशेि स र ु क्षा बल’ नामक एक बल
का षनमािि षकया है। इस बल को कान न ू ी तौर पर षकसी को भी शक क़ी षबना पर षगरफ़्तार करने , छह माह तक
अदालत में पेश षकये षबना षहरासत में रखने , तलाशी लेने आषद का प र ू ा अषधकार है। द स ू रे शब् दों में , योगी
आषदत् यनाथ उत् तर प्रदेश में षहटलर के गेस् टापो जैसी एक शषि बना रहा है र्क योंषक उसे पता है षक मर्जद र ू ों और
य व ु ाओ ं में बेरोर्जगारी और महूँगाई के कारि असन् तोि चरम पर है और उनके बीच कोई राजनीषतक नेत त् ृ व न जा
पाये या न पैदा हो पाये , इसषलए उसे पैदा होने से पहले ही खत् म करने के षलए एक ऐसे कान न ू क़ी र्जरूरत है। ऐस
कान न ू अन् य राज् यों ने पहले भी बनाये हैं जैसे षक महाराष्प ट्र में मकोका। ख द ु प ज ं ाब में भी प्रान् तीय सरकारों न
अलग-अलग समय पर ऐसे काले कान न ू बनाये हैं। ऐसे दमनकारी काले कान न ू बनाना षकसी भी राज् य सरकार क
अषधकार क्षेत्र में आता है। अबज़राफज़गकीषजए: षकसीषवषशष्टसषन्ध-षबन्दुपरकोईके न्रसरकारराज्य
सरकार में मौजूद पाटी के साथ राजनीषतक अन्तरषवरोध के कारण या ब ज
गआ
ज़ी के आपसी
अन्तरषवरोधोंके कारणइसक़ानूनकोिंर्करदे , तोसवगहाराशषियोंकाइसपरक्यास्टैड ि होना
चाषहए? क्यातबिीहमप्रान्तके संघीयअषधकारके इसउल्ल घ ं नकाषवरोधकरेंर्े ? ज़ाषहरातौरपर
नहीं!क्योंषकयहाूँ परप्रान्तसरकारद्वाराबनाये र्एक़ानूनव्यापकमेहनतकशजनताके वर्ग षहतोंके
षख़लाफ़जाते हैं।संक्षेपमें कहें तोहमप्रान्तोंके संघीयअषधकारोंकोकोईपषवत्रवस्त ु नहींमानते हैं
षजनकाउल्लंघनहोनेपरहमसडकोंपरउतरजायें।हमेंहरमसलेमेंयहदेखनाहोताहैषकसवगहारावर्ग
औरअर्द्गसवगहारावर्ग समेतआमग़रीबमेहनतकशजनताके हक़औरषहतक्याहैं औरउनपरक्या
प्रिाव पडता है। षनरपेक्ष रूप से प्रान्तीय संघीय अषधकारों के उल्लंघन पर शोर-र्ुल मचाना एक
कम्युषनस्टअवषस्थषतनहींहै , बषल्कएकटटपुूँषजयालोकरंजकतावादीऔरक़ौमवादीअवषस्थषतहै ,
जोषकक्षेत्रीयपूूँजीपषतवर्गके षहतोंकीसेवाकरतीहैनषकसवगहारावर्गके षहतोंकी।
प्रान् तों के संघीय अषधकारों को लेकर षवषक्षप् त शोर मचा रहे इन ट्रॉट-ब ड ु िवादी म ख
ों को चलते - चलते यह भी बता
दें षक षबहार क़ी प्रान् त सरकार ने ही 2006 में अपने प्रदेश में ए.पी.एम.सी. कान न ू को रद्द कर षदया था। इसी प्रकार
महाराष्प ट्र क़ी प्रान् त सरकार ने ही 2018 में अपने प्रान् त के ए.पी.एम.सी. कान न ू में ठीक वे ही पररवतिन षकये थे , जो
षक आज मोदी सरकार के पहले कृ षि अध् यादेश द्वारा षकये जा रहे हैं। अब अगर इन अनपढ़ “मार्क सिवाषदयों” का
संघवाद के प्रषत दीवानापन षनरन् तरताप ि ू ि है , तो उन् हें इन प्रान् त सरकारों के इन कदमों का भी स् वागत करना चाषहए,
र्क योंषक जो भी संघीय अषधकार और संघवाद के तहत हो रहा है , वह द रु ु स् त है ! यहहैइनअनपढ़ोंकीसमस्या।
ये अपने क़ौमवादऔरअषस्मतावादमें अन्धे होकरब ष ु नयादीवर्ग षवश्लेिणिीिूलचुकेहैं , हालांषक
वे इसमें किीिीबह तषनपुणनहींथे।ये अपने हीकुतकोंके षवरोधािासोंमें आएषदननटखटमूखग
षबल्ले के समानफंसे ह एनज़रआते हैं , जोऊनके र्ोले में उलझजाताहै , औरषफरबेशमग तरीक़े से
बातोंकोबदलनेके उपक्रममेंलर्जातेहैं।
इसषलए असल बात षजसे समझा जाना चाषहए वह यह है षक सविहारा वगि अपने आप में प्रान् तों के संघीय
अषधकार के शोरगुल में शाषमल नहीं होता है और हरे क मसले पर अपने वगि षहतों के नर्जररये से षवचार करता है।
षजन षस्थषतयों में प्रान् तों के स घ ं ीय अषधकारों का उल् लंघन सविहारा वगि के षखलाफ भी जाता है , वहाूँ हम संघवाद
के षनरपेक्ष समथिन क़ी र्जमीन से उसक़ी मुखालफत नहीं करते , बषल्क सकारात् मक तौर पर सविहारा वगि औरअद्धिसविहारा वगि के षहतों क़ी षहफार्जत क़ी र्जमीन से जनवाद क़ी माूँग करते हैं और उनके जनवादी व नागररक
अषधकारों के उल् लंघन का षवरोध करते हैं।
हमारे ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों क़ी समझ में यह सीधी-सी बात नहीं आ रही है। अब चूंषक षवचारधारात्मक व
राजनीषतकदीवाषलयापननेउनकीषस्थषतकोख़राबकरषदयाहै , तोप ज
ाबके िीतरउनके षलएअपने
कायगक्रमऔररणनीषतकअवषस्थषतकोषतलांजषलदेकरनरोदवाषदयोंकीज ट ु ानके पीछे पूंछपकडकर
चलनाएकमजब र ू ीहोर्याहै।लेषकनऐसाकरतेह एवहमौज द ू ाषकसानआन्दोलनमेंलािकारीम ल् ू य
कासमथगनिीनहींकरसकतेऔरषवरोधिीनहींकरसकते।समथगनकरेंर्ेतोप ज
ाबके आन्दोलनमें
इनकामखौलबनजायेर्ाऔरषवरोधकरेंर्े तोधनीषकसानोंऔरकुलकोंके आन्दोलनके म च
पर
इन्हें जर्हषमलनीतोदूर , इनकीदूसरे प्रकारसे आविर्तिीहोसकतीहै ! लेषकनइन्हें अबइनमंचों
का सहारा िी चाषहए और इनका षपछलग्र्ू बनना िी इनके षलए ज़रूरी हो र्या है। तो इन्होंने एक
मूखगतापूणग तरीक़ाषनकालाहै इनमंचोंपरजर्हपाने का:लािकारीमूल्यपरचुप्पीबनाये रखते ह ए,
के वलप्रान्तोंके संघीयअषधकारोंपरहमलेकाषवरोधकरनेके नामपरइनकृषिअध्यादेशोंकाषवरोध
करोऔरषकसीतरहइनमंचोंके कोनेमेंथोडी-सीजर्हपालो!
इन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों ने एक और मर्जाषकया दलील पेश क़ी। अब च ंष ू क इन् हें धनी षकसानों व कुलकों के मंच पर
जाकर प छ
ल् लावाद करना था, इसषलए इन् हें अपने इस अवसरवाद का औषचत् य-प्रषतपादन भी करना था। इसक
षलए इन् होंने आूँखें च ंष ु धया देने वाला एक चमत् कारी तकि षदया! इन्होंने कहाषकये िारतीयषकसानयूषनयन
के मंच पर जाकर धनी षकसानों और कुलकों के राजनीषतक नेतृत्व से ग़रीब षकसानों और खेषतहर
सवगहाराकोमुक्तकरेंर्े औरबतायेंर्े षकउनके वर्ग षहतधनीषकसानोंवकुलकोंसे अलर्हैं औरयह
षकउन्हें लािकारीमूल्यकीलडाईमें धनीषकसानोंवकुलकोंकासाथनहींदेनाचाषहए!वाह!ऐसी
तकग पर्द्षतपरहमवारे जायें ! यहवैसाहीहै जैसे षकआपकारसेवकोंके प्रदशगनके मंचपरजाकरउन्हें
मषन्दरषनमागणके षवरुर्द्सहमतकरनेकादावाकरें।
यानीषकआपधनीषकसानोंवकुलकोंकीअर्ुवाईकरने वाले िारतीयषकसानयूषनयनके षवषिन्न
धडोंके संयुक्तमोचे के प्रदशगनमें उन्हींकीर्ोदमें बैठकरग़रीबषकसानोंऔरखेतमज़दूरोंकोयह
बतानेकादावाकररहेहैंषकउनके षहतधनीषकसानोंवकुलकोंके षवरुर्द्हैं ?! क्यामज़ाक़है ! सच् चाई
यह है षक आप उस मंच पर जाकर क्षेत्रीय ब ज ु िआ
र्जी के संघवाद के नारे क़ी प ंछ
पकडकर लटके हुए थे और
लाभकारी मूल् य क़ी माूँग के प्रषतषक्रयावादी चररत्र के बारे में आपने गरीब व षनम् न मध् यम षकसानों को स् पष्प ट शब् दों
में यह नहीं बताया षक यह माूँग षकसानों क़ी 90 फ़ीसदी आबादी के षखलाफ जाती है , यह प र ू े मर्जद र ू वगि क
षखलाफ जाती है , यह सम च ू ी आम मेहनतकश आबादी के षखलाफ जाती है और यह म ल
त: ग्रामीि प ूँज ू ीपषत वग
क़ी माूँग है। धनी षकसानों के इस मंच पर चल रही षफल् म में इन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों को जो भ ष ू मका षमली थी, वह
वही थी षजसमें वे संघवाद का राग गाते हुए पल भर को पीछे भीड में खडे षदखाई पडते हैं !
यह और कुछ नहीं बषल्क इन ट्रॉट-बुडिवादी क़ौमवाषदयों का एक शमगनाक अवसरवाद,
लोकरंजकतावाद और दषक्षणपन्थी िटकाव है जो षक मज़दूर वर्ग और ग़रीब षकसान वर्ग के बीच
षवभ्रमफै लायेर्ा, उन्हेंधनीषकसानोंवकुलकोंकापुछल्लाबनायेर्ाऔरएकस्वतंत्रराजनीषतकशषिके तौरपरउन्हें स र् ं षठतनहींहोने देर्ा।इसरूपमें यहरुझानआजप ज
ाबके आन्दोलनकोकाफ़ी
न क़
सानपह ूँचारहीहै , क्योंषककम-से - कमऔपचाररकतौरपरइसरुझानकोमानने वाले अिीिी
समाजवादीक्राषन्तकीबातकरते हैं , हालांषकषबल्कुलत्रॉत्स् क
ीपन्थीतरीक़े से क्योंषकइनके अन स
ार
प ज
ाबएकदषमतक़ौमहै औरवहाूँ क्राषन्तकीम ष ं ज़लसीधे समाजवादीहै ! इनकीइसप र ू ीअवषस्थषत
कीआलोचनाआपयहाूँपढ़सकतेहैं:
http://ahwanmag.com/archives/7567
इसी उपक्रम में इन ट्रॉट-ब ड ु िवादी कौमवाषदयों ने एक और मर्जाषकया बात कही है। इनका कहना है षक ‘एक देश -
एक बार्जार’ बनाने का मोदी सरकार का नारा दरअसल कौमों को कुचलकर एक एक़ीकृ त षहन् दू राष्प ट्र का षनमािि
करने क़ी साषर्जश है ! इससे ज़्यादा म ख
िताप ि ू ि बातें कुछ ही हो सकती हैं , और वे बातें भी हमारे ये कौमवादी ही
बोल रहे हैं। असल में इन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों के षदमाग में मार्क सिवाद तो बचा नहीं, बस टटप ूँष ु जया कौमवाद बचा है ,
तो इन् हें हर प्रकार का दमन या उत् पीडन या शोिि कौमी दमन और संघवाद का उल् लंघन नर्जर आता है। बडी
दयनीय षस्थषत है बेचारों क़ी!
पहली बात तो यह है षक खेती के उत् पादों के एक़ीकृ त बार्जार का कायिक्रम भारत के प ूँज ू ीपषत वगि का प र ु ाना
कायिक्रम है और कांग्रेस क़ी सरकारों ने भी इस मसले को कई बार उठाया था। द स ू री बात, यषद कोई कम् य ष ु नस् ट
भ ल
े से संघवाद के क्षेत्रीय ब ज ु िआ
र्जी के षसद्धान् त के गि्ढे में भी षगर जाता है , तो षकसी एक राज् यसत् ता के मातहत
आषथिक अथों में षवघटन और षबखराव का वह समथिन नहीं करता है र्क योंषक यह सविहारा वगि के षहतों के भी
षखलाफ जाता है। यह बात दीगर है षक खेती के उत् पादों के बार्जार का यह समेकन आज नवउदारवादी
भ म ू ड िलीकरि क़ी नीषतयों के मातहत हो रहा है , न षक षकसी राष्प ट्रीय साम्राज् यवाद-षवरोधी कायिक्रम के मातहत।
लेषकन इसका अथि यह नहीं है षक कम् य ष ु नस् टों का यह नारा हो षक खेती के उत् पादों के षलए एक देश , बहुत स
बार्जार! यह एक मर्जद र ू -वगि के षखलाफ जाने वाला नारा है र्क योंषक यषद बार्जार में प ूँज ू ी के म र्क ु त प्रवाह को रोकन
वाली बाधाएं या इम् पफे र्क शंस मौज द ू हैं , तो वह प ूँज ू ीवाद के षवकास को भी बाषधत करते हैं , असमान षवकास को
बढ़ावा देते हैं और श्रम क़ी आवाजाही को भी बाषधत करते हैं और इस रूप में प्रषतषक्रयावादी होते हैं। द स ू रे शब् दों
में , इस प्रकार का मर्जाषकया तकि देकर भी इन अध् यादेशों का सविहारावगीय षवरोध नहीं षकया जा सकता है। इसक
अलावा, ऐसे तकि यही षदखलाते हैं षक इन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों को मार्क सिवाद का ‘क ख ग’ भी नहीं आता है।
मार्क सिवाद के ब ष ु नयादी षसद्धान् तों क़ी इनक़ी “समझदारी” के बारे में जानने के षलए आप इन षलंर्क स पर जा सकत
हैं:
http://ahwanmag.com/archives/7585
http://ahwanmag.com/archives/7590
ल ब् ु बेल ब ु ाब यह षक इन कृ षि अध् यादेशों का षवरोध करने में प्रान् तों के संघीय अषधकारों के षहफार्जत क़ी
अवषस्थषत अपनाना या एक़ीकृ त बार्जार का टटप ूँष ु जया षवरोध करना नरोदवाषदयों, कौमवाषदयों और
अवसरवाषदयों का नर्जररया है , न षक कोई सविहारा नर्जररया।इससे ज ड ु ीह ईबातहीयहहै षकहमारे ट्रॉट-ब ड ु िवादीइनअध्यादेशोंके मसले कोक़ौमीदमनका
मसलाबनाकरपेशकररहे हैं ! इससे िय क
रहास्यास्पदबातऔरकुछनहींहोसकती। इनका मानना ह
षक इन अध् यादेशों के र्जररये कौमों क़ी स् वायत् तता को छीना जा रहा है और इनके अन स ु ार लेषनन एक राज् य क
मातहत कौमों क़ी स् वायत् तता क़ी षहमायत करते थे और इस स् वायत् तता क़ी षहमायत षकये षबना, राष्प ट्रों क
आत् मषनििय के अषधकार क़ी बात करना बेमानी है ! यह प र ू ी कायिषदशा भय क
र कौमवादी है और इसका लेषनन क़ी
समझदारी से कोई लेना-देना नहीं है। यषद प ज
ाब दषमत राष्ट्र है , तो लेषननवादी कायगषदशा उसके षलए
स्वायत्तताकाकायगक्रमनहींपेशकरतीहै , बषल्कअलर्राष्ट्र -राज्यके षनमागणकाकायगक्रमपेशकरती
है। प ज ं ाब को दषमत कौम मानने के बावज द ू इन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों द्वारा महर्ज स् वायत् तता और स घ ं ीय अषधकारों
क़ी बात करना सीधे - सीधे ऑस् ट्रो-मार्क सिवाद व ब ड ु िवाद के गि्ढे में षगरना है , षजसमें षक हमारे ट्रॉट-ब ड ु िवादी
पहले से ही षगरे हुए हैं। लेषकनसबसे िय क
रअपराधतोयहहै षकक़ौमीसवालपरएकसुधारवादी
कायगषदशाकोये लेषननपरआरोषपतकरने काप्रयासकररहे हैं।यषदहमारे ट्रॉट-बुडिवादीपंजाबको
एकदषमतक़ौममानते हैं औरइनअध्यादेशोंकोिीक़ौमीदमनकाहषथयारमानते हैं , औरलेषननके
अनुयायी होने का िी दावा करते हैं , तो इन्हें पंजाब में सीधे अलर् होने या न होने के सवाल पर
रेफ़रेड ि मकीमाूँर्उठानीचाषहए, नषकइसीराज्यके मातहतरहते ह एमहज़संघीयअषधकारोंऔर
स्वायत्ताकी।लेषकन इन बेचारों में इतना साहस भी नहीं है षक यह माूँग उठा सकें और इन् होंने साषर्जशाना तरीक
से आत् मषनििय के प र ू े अषधकार को संघवाद और स् वायत् ता के अषधकार में अपचषयत कर षदया है। इनक़ी य
लफ़्फषर्जयाूँ अब बेईमानी के स् तर पर जा रही हैं।
श द्ध
त: स् थानीय मसलों में कौमों क़ी स् वायत् तता का कायिक्रम के वल तभी लागू होता है , जब कई कौमें आपसी
सहमषत से एक राज् य के मातहत रहने का फै सला करती हैं। इस स र ू त में भी लेषनन संघवाद क़ी सख् ़त शब् दों म
मनाही करते हैं और एक जनवादी के न् रीयता के ढाूँचे क़ी षहमायत करते हैं। लेषकनइनट्रॉट-बुडिवाषदयोंके
अनुसारतोिारतमें सिीक़ौमें दषमतहैं , षजन्हें एकऐसीबडीबुज गआ
ज़ीदबारहीहै , जोषककोईिी
क़ौमीपहचाननहींरखतीहै (चाहे एक-क़ौमीपहचानयाबह -क़ौमीपहचान!)।ऐसे में , ये दषमतक़ौमें
अपनीइच्छासे िारतकीराज्यसत्ताके मातहतनहींमानीजायेंर्ी, औरठीकइसीषलएवे दषमतक़ौमें
कही जा सकती हैं। लेषकन यषद वे अपनी इच्छा के षवरुर्द् िारत की राज्यसत्ता की राजनीषतक
सीमाओ ं मेंशाषमलकीर्यीहैं , तोउनके षलएलेषननवादीकायगक्रमस्वायत्ततावसंघवादके अषधकार
कीमाूँर्उठाने कानहींहोता, जोषकलेषननकीदृषिमें क़ौमीसवालपरअक्षम्यसुधारवादहै , बषल्क
अलर्होनेके अषधकारकाहोताहै।
अबअलर्होनेके अषधकारकीमाूँर्उठानेकीषहम्मतहमारेट्रॉट-बुडिवाषदयोंमेंहैनहीं!लेषकनक़ौमी
दमनकोिीउन्हेंषकसीिीक़ीमतपरऔरहरमसलेपरसाषबतकरनाहै ! ऊपरसेवहलािकारीमूल्य
का नतो षवरोध कर सकते हैं (क्योंषक षफर इनकी ख़ द ु की क़ौमी खेषतहर ब ज
गआ
ज़ी से इन्हें थप्पड
पडेंर्े)औरनहीलािकारीमूल्यकाषवरोधकरसकते हैं (क्योंषकतबपंजाबके आन्दोलनमें ये हंसी
के पात्र बन जायेंर्े ! )। इस असमाधेय षवरोधािास में पडे हमारे ट्रॉट-बुडिवाषदयों ने इस उलझन से
षनकलने का नायाब तरीक़ा यह षनकाला षक कृषि अध्यादेशों को ही क़ौमी दमन कह षदया जाय!
लेषकन जब आप इस प्रकार के रषवड प्रािायाम करते हैं , तो आप और भी ज् ़यादा हास् यास् पद और अटपटे तरीकसे अपने षवरोधाभासों में उलझ जाते हैं। बस अफसोस यह है षक इस प्रषक्रया में ये ट्रॉट-ब ड ु िवादी मार्क सिवाद-
लेषननवाद के साथ बहुत ज् ़यादती करते हैं और आम लोगों में इसके प्रषत गलत स च ू नाएूँ और षवचार फै लाते हैं।
लेषकन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों ने तो मार्क सिवाद-लेषननवाद को षवकृ त करना आजकल अपना म ख् ु य पेशा बना षलया है।
ग़ौरतलबहै षकस्वय ं प ज
गआ
ज़ीइनअध्यादेशोंकाएकस्वरमें षवरोधनहींकर
ाबकीग़ैर -खेषतहरब ज
रहीहै , नहीसिीक़ौमोंकीखेषतहरब ज
गआ
ज़ीइसकाषवरोधकररहीहै। उल् टे भारत के राज् य के मातहत
रहने वाली समस् त गैर -दषमत कौमों, यानी षजनक़ी ब ज ु िआ
र्जी को भारतीय राज् यसत् ता में षहस् सेदारी हाषसल हो च क
़ी
है , क़ी बडी षवत् तीय-औद्योषगक ब ज ु िआ
र्जी एकमत से इन अध् यादेशों के समथिन में है , र्क योंषक यह उनके षहत में है।
इसके अषतररर्क त, स् वयं कई कौमों क़ी खेषतहर ब ज ु िआ
र्जी इन अध् यादेशों का एक स् वर में षवरोध भी नहीं कर रही है।
मसलन, महाराष्प ट्र के धनी षकसानों व कुलकों के अषधका श
स ग ं ठनों ने इन अध् यादेशों का स् वागत षकया है।
प्रम ख
तषमलनािु व आन्रप्रदेश में भी स् वयं खेषतहर ब ज ु िआ
र्जी के बीच इन अध् यादेशों के षवरोध के कायिक्रम क़ी कोई
व् यापक अपील षवकषसत नहीं हो पायी। उसी प्रकार अन् य कई कौमों क़ी बुज िआ
र्जी ए.पी.एम.सी. क़ी व् यवस् था को
पहले ही भंग कर च क
़ी थी या उसे षनष्प प्रभावी बना च क
़ी थी। यह उन् होंने अपनी स् वायत् तता का उपयोग करते हुए
ही षकया, इसषलए इन कौमवाषदयों को इसका स् वागत करना चाषहए था! फर्जि कररए षक कुछ अन् य कौमों क़ी
ब ज ु िआ
र्जी के ही समान (मसलन, महाराष्प ट्र क़ी ब ज ु िआ
र्जी) पंजाब में भी ए.पी.एम.सी. व स ष ु नषित लाभकारी म ल् ू य
क़ी व् यवस् था को स् वयं पंजाब सरकार भंग करती या षनष्प प्रभावी बना देती, तो र्क या वह कौमी दमन माना जाता?
लेषकन एक स् थान पर वे इसे कौम क़ी आर्जादी पर हमला बता रहे हैं , तो द स ू री जगह वे इस पर च प् ु पी साधे हुए हैं।
यषद यह कौमी दमन का मसला है , तब तो इन ट्रॉट-ब ड ु िवाषदयों को मानना पडेगा षक इस मसले पर के वल पंजाब
का ही कौमी दमन हो रहा है र्क योंषक हररयािा अलग से कोई कौम नहीं है ! इनके षवचारों व दावों को यषद ताषकि क
पररिषत पर पहु च ूँ ाया जाये तो हास् यास् पद नतीजों का ढेर लग जाता है !
ट्रॉट-बुडिवाषदयों की इस अवषस्थषत से यह स्पष्ट हो चुका है षक इनका माक्सगवाद से पूणग रूप में
प्रस्थानहोचुकाहैऔरवर्गषवश्लेिणसेइनकाअबदूर -दूरतककोईताल्लुक़नहींहै।संक्षेपमेंयहषक
कोईिीरषवडप्राणायामकरके इनतीनकृषिअध्यादेशोंकोक़ौमीदमनकामसलानहींबनायाजा
सकताहै।इसतरहकीकोईिीकवायदएकबदशक्लचुटकुलेसेज़्यादाकुछनहींबनपायेर्ी।लेषकन
षसफ़ग इसीमसलेपरहीनहीं, हमारेट्रॉट-बुडिवाषदयोंनेहरमसलेपरहीअपनेआपकोएकिद्देलतीफ़े
मेंतब्दीलकरषदयाहै।
बहरहाल, आगे बढ़ते हैं।
इन सभी बातों को समझने वाले कुछ साथी भी एक सवाल को लेकर कुछ भ्रषमत हैं। वे समझते हैं षक मौज द ू ा
आन् दोलन धनी षकसानों व कुलकों का आन् दोलन है , उसक़ी माूँगों में सविहारा वगि का कोई लाभ नहीं है और
उनका वगि चररत्र प्रषतषक्रयावादी है , लेषकन वे इस बात पर षवचार कर रहे हैं षक र्क या तात् काषलक तौर पर
फासीवादी मोदी सरकार के षखलाफ ये धनी षकसानों-कुलकों का आन् दोलन हमारा रिकौशलात् मक षमत्र बन
सकता है ? इस बात पर षवचार करना भी यहाूँ प्रासंषगक होगा र्क योंषक यह भ्रम बहुत से गलत नतीजों पर ले जा
सकता है।8. क्या धनी षकसानों व कुलकों के इस आन्दोलन से तात्काषलक तौर पर
रणकौशलात्मकफ़ासीवाद-षवरोधीमोचागबनसकताहै ?
इसका सीधा उत् तर है: नहीं! र्क यों? फ़ासीवादके षवरुर्द्कोईतात्काषलकरणकौशलात्मकमोचाग िीऐसे
आन्दोलनोंके साथनहींबनसकताहै , षजनकीमाूँर्ें सीधे सवगहारावर्ग औरआममेहनतकशआबादी
के षख़लाफ़जातीहों। आम तौर पर ही यषद शासक वगि के दो धडों के बीच आपसी अन् तरषवरोध है , तो सविहारा
वगि दांव -पेच के तौर पर साझे शत्रु के षवरुद्ध शासक वगि के षकसी अलग ब् लॉक से रिकौशलात् मक मोचाि तभी
बना सकता है , जब षक उस ब् लॉक क़ी माूँगें सीधे सविहारा वगि के षखलाफ न जाती हों, जो षक अपवादस् वरूप
षस्थषतयों में ही होता है।
मौज द ू ा स र ू त में ऐसा नहीं है। धनी षकसान व कुलक वगि क़ी माूँगें न षसफि सविहारा वगि और आम मेहनतकश
आबादी के षखलाफ जाती हैं , बषल्क वे सीधे - सीधे सविहारा वगि और आम गरीब षकसान आबादी के षहतों पर
सषक्रयता से चोट कर रही हैं।
इसके अलावा, धनी षकसानों व कुलकों का यह वगि षकतनी फासीवाद-षवरोधी सम् भावनासम् पन् नता और
षवक वसनीयता रखता है , यह षवशेि तौर पर हम षपछले एक दशक में देख च क
े हैं। नवउदारवाद के दौर म
र्क लाषसक़ीय कुलक राजनीषत के षवघटन और प्रस् थान के साथ इस खाली जगह को संघ पररवार व भाजपा क़ी
फासीवादी राजनीषत व अन् य प्रकार क़ी दषक्षिपन्थी व धाषमिक कट्टरपन्थी राजनीषत ने तेर्जी से भरा है। षवशेि तौर
पर, पषिमी उत् तर प्रदेश और हररयािा में इस पररघटना को देखा जा सकता है। यह वगि अपनी प्रकृ षत से ही
फासीवाद-षवरोधी मोचे का संश्रयकारी नहीं बनता, बषल्क उल् टे फासीवाद का सामाषजक आधार बनने क़ी
सम् भावना-सम्पन् नता रखता हैं और कुछ षनषित षस्थषतयों में षवशेि तौर पर उत् तर भारत में बना भी है। तात् काषलक
तौर पर, षकसी आषथिक म द्द ु े या षकसी षवषशष्प ट माूँग पर इसका फासीवादी सरकार के साथ अन् तरषवरोध हो सकता
है , जो षक काफ़ी तीखा भी हो सकता है। लेषकनयहवर्ग मुख्यत:औरमूलत:षकसीफ़ासीवाद-षवरोधी
सम्िावनासम्पन्नतासे ररक्तहै औरमौक़ापडने परफ़ासीवाषदयोंके साथयाअन्यप्रकारकीधाषमगक
कट्टरपन्थीयादषक्षणपन्थीराजनीषतके साथखडाहोसकताहैऔरहाषलयादौरमेंहोतािीरहाहै।
इसके अलावा, गाूँवों में यह वगि दषलत खेषतहर मर्जद र ू आबादी का प्रम ख
उत् पीडक व शोिक षसद्ध हुआ है।
दरअसल, कुलकों व धनी षकसानों का यह वगि सम च ू ी खेत मर्जद र ू आबादी का प्रम ख
उत् पीडक व शोिक षसद्ध
हुआ है। इसक़ी वजह स् पष्प ट है। यह खेषतहर प ूँज ू ीपषत वगि अपने अषधशेि षवषनयोजन व म न ु ाफे के षलए म ख् ु य तौर
पर इसी खेत मर्जद र ू आबादी के श्रमशषि के दोहन पर षनभिर है। ऐसी स र ू त में अर्क सर ही यह होता है षक प्रम ख
शोिक वगि अपने द्वारा शोषित मेहनतकश जनता क़ी सामाषजक रूप से अरषक्षत षस्थषत का इस् तेमाल भी करते हैं ,
ताषक उनका सामाषजक उत् पीडन व दमन भी षकया जा सके , र्क योंषक यह सामाषजक उत् पीडन और दमन इन शोषित
वगों को आषथिक तौर पर और भी अरषक्षत बना देता है। अभी कुछ ही षदनों पहले प ज ं ाब और हररयािा में प्रवासी
मर्जद र ू ों क़ी कमी के कारि इन प्रदेशों के दषलत खेषतहर मर्जद र ू ों के साथ इन धनी षकसानों व कुलकों ने र्क या बतािव
षकया है , यह भी षकसी से षछपा नहीं है।इसके अलावा, षपछले षदनों में धनी षकसानों और कुलकों के इस वगि के बीच धाषमिक कट्टरपन्थी दषक्षिपन्थी
राजनीषत और साथ ही साम् प्रदाषयक फासीवादी राजनीषत क़ी बढ़ती जडों को भी सभी ने देखा है। यह इस वगि क़ी
आषथिक षस्थषत है जो इसे राजनीषतक प्रषतषक्रया क़ी र्जमीन बनाती है।
आज यषद यह वगि लाभकारी म ल् ू य के म ल
प्रक न पर सरकार के षखलाफ सडकों पर है , जैसा षक वह पहले भी
बीच-बीच में करता रहा है , तो इससे प्रगषतशील शषियों को बहुत आशाषन्वत होने क़ी आवक यकता नहीं है।
हमेशा क़ी तरह बडी इजारे दार प ूँज ू ी के हाथ को ऊपर रखने वाला कोई नया समझौता, कोई नया करार शासक वग
के इन दो धडों के भीतर कालान् तर में हो ही जायेगा, यह आन् दोलन षकसी क्राषन्तकारी उभार क़ी तरफ नहीं जान
वाला है ! ऐसी उम् मीद रखने वालों के बीच दरअसल यह उम् मीद एक नाउम् मीदी से पैदा हुई है।
यह अनायास नहीं है षक धनी षकसानों और कुलकों के पक्ष में तमाम पाषटियों के नेता, प ूँज ू ीवादी सडकछाप गायक,
अक लीलता में प्रषतस् पद्धाि करने वाले तमाम “कलाकार” उतर आये हैं , जो षक कुलक व धनी षकसानों क़ी आषथिक
शषिमत् ता के ही सांस् कृ षतक प्रतीक हैं और अपने गीतों आषद में इसी ‘चौधर क़ी हनक’ को पेश करते नर्जर आत
हैं। कुछमूखगअनपढ़“माक्सगवादी” कहरहेहैंषकयेर्ायक-कलाकारआषदइसआन्दोलनकोहडपरहे
हैं , जबषकसच्चाईयहहैषकइसआन्दोलनकास्वािाषवकवर्गचररत्रउन्हेंआकषिगतकररहाहैऔरवे
आन्दोलनकोहडपनेनहींआएहैं , बषल्कअपनीस्वािाषवकवर्गअवषस्थषतसेउसकीओरआयेहैं।
यह प्रगषतशील शषियों का पराजयवाद है जो उन् हें ऐसे मर्जाषकया तकि देने क़ी ओर ले जा रहा है षक धनी षकसानों
और कुलकों के इस आन् दोलन के साथ रिकौशलात् मक तौर पर एक फासीवाद-षवरोधी संय र्क ु त मोचाि बना षलया
जाय। इस आन् दोलन से क्राषन्तकारी शषियाूँ ऐसा कोई मोचाि बनाकर (हालांषक ऐसा मोचाि बन पाना ही बेहद
म ष ु ककल है) अपने ही पैरों पर कुल् हाडी मारें गी। ल ब् ु बेल ब ु ाब यह षक अपने पराजयबोध के कारि प्रगषतशील दायरों
क़ी जो ताकतें धनी षकसानों व कुलकों के इस आन् दोलन से फासीवाद-षवरोधी मोचाि बनाने का य ट ू ोषपयाई और
अव् यावहाररक षवचार पाले हुए हैं , वह कतई न क
सानदेह है और हमें अपनी शषियों को षवकषसत करने और एक
स् वतंत्र राजनीषतक अवषस्थषत को षवकषसत करने से रोके गा। साथ ही, इस प्रकार के संश्रय के प्रस् ताव के पीछ
फासीवाद-षवरोधी ‘पॉप् य ल
र फ्रड ट’ के मॉिल का एक दररर संस् करि भी खडा है , जो षक षवशेि तौर पर आज क
दौर में , फासीवाद-षवरोधी रिनीषत और कायिनीषत, दोनों के ही तौर पर, न षसफि षनष्प प्रभावी होगा बषल्क
न क
सानदेह होगा। भारत में फासीवाद के उभार के षवशेि तौर पर षपछले चार दशकों ने षदखलाया है षक आज क
दौर में फासीवादी उभार के प्रषतरोध के कायिभार को कोई भी ब ज ु िआ
ताकत (चाहे वे कुलक-धनी षकसान वगि का
प्रषतषनषधत् व करने वाले राजनीषतक दल व संगठन ही र्क यों न हों) नहीं षनभा सकती है और के वल कम् य ष ु नस् ट
क्राषन्तकारी शषियाूँ ही इसे अंजाम दे सकती हैं और इसषलए आज के दौर में फासीवाद-षवरोधी मर्जद र ू वगीय
मोचे क़ी कायिषदशा ही कामयाब हो सकती है। इस षबन् दु पर हम यहाूँ और षवस् तार में षवचार नहीं कर सकते और
अन् यत्र हमने इस पर षवस् तार से अपनी बात रखी है (http://www.mazdoorbigul.net/archives/7743)।
9.षनष्किग
हमारे षलए इस प र ू ी चचाि के म ख् ु य नतीजे र्क या हैं ?सबसे पहलानतीजातोयहहै षकइनतीनकृषिअध्यादेशोंमें जोबातव्यापकमेहनतकशजनताके
षख़लाफ़जातीहै वह है आवश्यकवस्त ओ
ं की स्टॉषकंर्वव्यापारके षवषनयमनकोसमाप्तषकया
जानाक्योंषकयेइनब ष ु नयादीचीज़ोंकीजमाखोरी, कालाबाज़ारीऔरबाज़ारक़ीमतोंकोबढ़ावादेर्ा।
इसका लाभ व् यापाररयों और मध् यस् थों को षमलेगा जो षक खेती के उत् पाद के षवपिन के मामले में अर्क सर स् वय
धनी षकसान व कुलक भी होते हैं। यही वजह है धनी षकसानों व कुलकों को इस प्रावधान पर उतनी आपषि है भी
नहीं और इसका षवरोध करने में बस वह कभी-कभी र्जबानी जमाखचि मात्र कर रहे हैं या प र ू ी तरह च प ु हैं।
दूसरीबात, इनधनीषकसानोंऔरकुलकोंके षलएए.पी.एम.सी.मषडियोंकोबचानािीअपनेआपमें
कोई म द्द ु ा नहीं है और अर्र सरकार लािकारी म ल् ू य को इनका क़ान न ू ी अषधकार बना दे तो ये
ए.पी.एम.सी.मषडियोंकोकचरा-पेटीमेंफें कनेके षलएप र ू ीतरहसेतैयारहैं।
तीसरी बात यह है षक यषद कुछ राज् यों में खेती के उत् पाद के षवपिन पर ए.पी.एम.सी. मषडियों का एकाषधकार
समाप् त होता है , तो भी इनके षवपिन का अवसरंचनात् मक ढाूँचा पैदा होगा ही र्क योंषक उनके खत् म होने से कृ षि
उत् पादों का षवपिन ही नहीं रुक जायेगा। यहअवश्यहैषकअषधकपूूँजी-सघनबननेके कारणइसमेंसेउस
सूरतमें छंटनीिीहोसकतीहै , षजससूरतमें षवस्ताररतपुनरुत्पादनऔरनतीजतनषवस्ताररतषवपणन
वव्यापारहीरुकजाए।कोईज़रूरीनहींहैषकऐसाहीहोर्ा, हालांषकसंकटके अषधकर्हरानेपरऐसा
होिीसकताहै।
चौथीबातयहहै षकइसवजहसे कम्युषनस्टमशीनीकरणवतमामसेक् ट रोंके अषधकपूूँजी-सघनहोने
काषवरोधिीनहींकरसकतेहैं , षकवहप्रषतइकाईरोज़र्ारकोकमकरेर्ा।यहएकरूमानीवादीऔर
प्रषतषक्रयावादीप्रूधोंवादीयाषसस्मोंदीवादीअवषस्थषतकीओरजाने के समानहोर्ा। ऐषतहाषसक तौर
पर, बडे पैमाने पर उत् पादन और षवतरि क़ी व् यवस् था का उभरना, उनका अषधक से अषधक प ूँज ू ी-सघन बनना एक
प्रगषतशील कदम होता है।
पांचवीबातयहषकए.पी.एम.सी.मडिीमें कामकरने वाले मज़दूरोंके षलएमूलत:औरमुख्यत:फकग
षसफ़ग यहहोर्ाषकउनकीश्रमशषिके शोिकबदलजायेंर्े।ग्रामीणपूूँजीपषतवर्गयानीधनीषकसानों,
कुलकों, व्यापाररयों, सूदखोरोंऔरआढ़षतयोंकीजर्हबडीकारपोरेटपूूँजीउनके श्रमशषिकादोहन
करेर्ी। इसमें अपने आप में इन मषडियों में काम करने वाले सविहारा वगि का न तो कोई षवशेि फायदा है और न
ही कोई षवशेि न क
सान। ये मर्जद र ू अषधकांशत: पहले से ही ठे के या षदहाडी पर न् य न ू तम मर्जद र ू ी से बेहद कम
मर्जद र ू ी पर काम करते हैं। पंजाब में इन मषडियों में काम करने वाले मर्जद र ू ों क़ी संख् या 2 से 3 लाख के बीच है।
इन् हें इन मषडियों में साल में 5 से 6 महीने ही काम षमलता है। अर्क सर इनमें अच् छी-खासी तादाद खेषतहर मर्जद र ू ों
क़ी भी होती है। इन् हें ये धनी षकसान और आढ़ती जमकर षनचोडते हैं और कोई भी श्रम अषधकार नहीं देते। ऐसे में ,
इनक़ी षस्थषत कारपोरे ट प ूँज ू ी के प्रवेश से और ब र ु ी हो जायेगी इसक़ी ग ंज ु ाइश कम है , र्क योंषक इससे ब र ु ी षस्थषत
होना म ष ु ककल है।
छठीबात,जहाूँ तकलािकारीमूल्यकोसुषनषितकरने वालीसारीमाूँर्ोंकाप्रश्नहै , वहिीकुल
अषधशेि षवषनयोजन में कारपोरेट पूूँजीपषत वर्ग द्वारा खेषतहर पूूँजीपषत वर्ग के बरक्स अपना षहस्सा
बढ़ाने और कुल अथगव्यवस्था में औसत मज़दूरी पर बढ़ने के दबाव को रोकने की कवायद है। दूसरेशब्दोंमें , ये माूँर्ें प ूँज
ीपषतवर्ग के दोधडों, यानीइजारेदारबडाप ूँज
ीपषतवर्ग (षजसमें स्वय ं प ज
ाबऔर
हररयाणाकाबडाइजारेदारप ूँज
ीपषतवर्ग िीशाषमलहै)औरग्रामीणखेषतहरप ूँज
ीपषतवर्गयानीधनी
षकसानोंवकुलकोंके वर्ग के बीचकाअन्तरषवरोधहै , जोषककुलषकसानआबादीकामात्र3-4
प्रषतशतहै। इसमें सविहारा वगि भला धनी षकसानों और कुलकों के षहतों क़ी रक्षा करने क़ी अवषस्थषत अपनाकर
उनक़ी पालक़ी का कहार र्क यों बनेगा? चाहें आप स घ ं वाद का हवाला देकर धनी षकसानों व कुलकों के म च
पर इन
कृ षि अध् यादेशों का षवरोध करने जायें , चाहें आप ए.पी.एम.सी. मड िी के मर्जद र ू ों के रोर्जगार का हवाला देकर इन
धनी षकसानों व कुलकों के म च ं पर जायें , या षफर आप गरीब षकसानों और खेत मर्जद र ू ों को धनी षकसानों व
कुलकों के राजनीषतक नेत त् ृ व से म र्क ु त कराने (!!!) का मर्जाषकया होने क़ी हद तक झ ठ ू ा दावा करते हुए धनी
षकसानों व कुलकों के इन म च ं ों पर जायें ; इनम च
ोंपरजाकरआपमूलत:धनीषकसानोंऔरकुलकोंकी
लािकारी मूल्य की प्रषतषक्रयावादी माूँर् का समथगन ही कर रहे होंर्े , चाहे आप इनके समथगन में
सकारात्मकतौरपरएकशब्दिीबोलने से बचषनकलें।यहशुर्द्अवसरवादऔरमज़दूरवर्ग के साथ
षवश्वासघातहै , औरकुछनहीं।
सातवीं बात, ग़रीब षकसानों और खेत मज़दूरों के बीच स्वतंत्र राजनीषतक वर्ग चेतना और संर्ठन
षनमागण के राजनीषतक प्रचार को धनी षकसानों व कुलकों के मंच पर आयोषजत षकया ही नहीं जा
सकताहै।इसप्रचारकोलर्ातारर्ाूँवोंमें चलानाहोर्ाऔरइसके षलएअलर्राजनीषतकमंचोंका
षनमागणकरनाहोर्ा। कौन यह कायि करता है या कर पाता है , यह एक दीगर सवाल है। जहाूँ तक कायिषदशा का
प्रक न है , यही एकमात्र सही कायिषदशा हो सकती है। जैसा षक हमने पहले कहा, आप कारसेवकों के प्रदशिन के मंच
पर मषन्दर षनमािि के षखलाफ बहस करने नहीं जा सकते हैं , यह सम् भव ही नहीं है। ऐसादावाकरनेवालाव्यषि
के वलएकअवसरवादी, लोकरंजकतावादीऔरकायरहै , जोषकअपनेपलायनवादकोषछपानहींपा
रहाहै।
आठवीं बात, ग़रीब षकसानों और खेत मज़दूरों का मुख्य मसला क्या है ? उनके दो मुख् य मसले हैं:
पहलाहैरोज़र्ारर्ारडटीकाहक़औरदूसराहैखेतमज़दूरोंके षलएसिीश्रमअषधकारोंकोसुषनषित
करने कीलडाई।इसक़ी वजह यह है षक तीन-चौथाई से भी ज् ़यादा षकसानों क़ी कुल आमदनी का औसतन
के वल 16 से 40 प्रषतशत खेती से आता है , बाक़ी उजरती श्रम से , यानी मर्जद र ू ी करके । द स ू री बात, यह 16 से 40
प्रषतशत आमदनी भी अषतशोिि करवाकर आती है र्क योंषक वे सीधे सरकारी मषडियों में बेच ही नहीं पाते हैं , कर्ज
तले दबे रहते हैं और धनी षकसानों, कुलकों, स द ू खोरों और आ ढ़षतयों (जो षक उनके षलए अर्क सर एक ही व् यषि
होता है) को लाभकारी म ल् ू य से बेहद कम दामों पर अपने उत् पाद को बेचने के षलए मजब र ू होते हैं। इसषलए
लाभकारी म ल् ू य या लागत मूल् य क़ी लडाई से इस वगि का कोई लेना-देना नहीं है। इसकीलडाईके के न्रमें है
रोज़र्ारर्ारडटीकाहक़औरसाथहीएकमज़दूरके तौरपरसिीश्रमअषधकारोंकीर्ारडटीऔरसाथ
हीसूदखोरों, धनीषकसानों, कुलकोंवआढ़षतयोंकीअसामान्यरूपसेअषधकब्याज़दरवालेकजोंसे
मुषि। जब धनी षकसान व कुलक कर्जि माफ़ी क़ी माूँग सरकार से करते हैं (जो षक कई दफा प र ू ी भी हो जाती है ! )
तो र्क या वे पट्टे पर र्जमीन लेकर खेती करने वाले खेषतहर मर्जद र ू और गरीब षकसानों के अन् यायप ि ू ि कर्जि माफ करत
हैं या उनसे वस ल
े जाने वाले प ूँज ू ीवादी लगान को कम या माफ करते हैं ? कभी नहीं!नौवींबात, जहाूँ तकमध्यमध्यमवषनम्नमध्यमषकसानोंकासवालहै , जोषककिी-किीउजरती
श्रमकाशोिणकरते हैं याकमपैमाने परउजरतीश्रमकाशोिणकरते हैं , वे िीलािकारीम ल् ू यका
ज़्यादाफ़ायदानहींउठापातेहैं।इनमेंिीषनम्नमध्यमषकसानषबरलेहीउजरतीश्रमकाशोिणकरतेहैं
औरम ख्
यत:अपनेऔरअपनेपररवारके श्रमके ब त ू ेहीखेतीकरतेहैं।येवर्गिीक़ज़गतलेदबारहताहै
औरइसकाबडाषहस्सासवगहाराओ ं कीक़तारमें शाषमलहोताजाताहै।मध्यमध्यमषकसानवर्ग के
उत्पादकािीम ष ु श्कलसे14-15फीसदीहीलािकारीम ल् ू यपरषबकपाताहै , अर्रकिीषबकपाता
हैतो। लेषकन इसक़ी वजह से वे इस भ्रम में रहते हैं षक लाभकारी म ल् ू य बढ़ने का उन् हें कोई लाभ षमलेगा। सच् चाई
यह है षक ये आबादी भी अषधका श
मामलों में म ख् ु यत: कृ षि उत् पादों क़ी खरीदार है न षक षवक्रेता। यषद इन् ह
लाभकारी मूल् य बढ़ने से कोई न क
सान नहीं भी होता, तो कोई फायदा भी नहीं होता है। इनके बीच सविहारा
शषियों को सतत् प्रचार करना चाषहए षक उनके षहत धनी षकसानों व कुलकों के साथ नहीं ज ड ु े हैं , बषल्क
सविहारा वगि के साथ ज ड ु े हैं। 2011 में ही लगभग 50 प्रषतशत षकसान पहला अवसर षमलते ही खेती छोडना
चाहते थे और सरकारी नौकरी के षलए ररक वत देने तक के षलए अपना खेत बेचने को तैयार थे। इन षकसानों म
गरीब व पररषधगत षकसानों के अलावा एक अच् छी-खासी तादाद मध् य मध् यम व षनम् न मध् यम षकसानों क़ी थी।
यहीषदखलाताहै षकइनकीप्रमुखमाूँर्अबरोज़र्ारके हक़कीबनतीजारहीहै औरये खेतीसे तब
तकषचपके ह एहैं , जबतकषककोईऔरषवकल्पषनर्ाहमें नहींहै। षपछले दशक में जो 1 करोड से भी
ज् ़यादा षकसान बरबाद होकर मर्जद र ू ों क़ी कतार में शाषमल हुए हैं , उनका 95 प्रषतशत षहस् सा गरीब, पररषधगत
षकसानों और षनम् न मंझोले षकसानों का ही है। मध् यम षकसानों में से कई क़ी जोतों का आकार घट गया और व
षनम् न मध् यम और गरीब षकसानों क़ी तादाद में शाषमल हो गये हैं।
दसवींबात, लुब्बेलुबाब यह षक ग़रीब, षनम्न मध्यमऔर मध्यम षकसानों कीबह स ख्
या की षनयषत
पूूँजीवादीव्यवस्थामें तबाहहोने कीहीहै।छोटे पैमाने के उत्पादनऔरइससम च
े वर्ग कोबचाने का
कोई िी वायदा या आश्वासन इन वर्ों को देना उनके साथ ग़द्दारी और षवश्वासघात है और उन्हें
राजनीषतकतौरपरधनीषकसानोंऔरकुलकोंकाषपछलग्र्ू बनानाहै। तो षफर इनके बीच में हमें र्क या
करना चाषहए? जैसा दक लेदनन ने कहा था: सच बोलना चादहए! सच बोलना ही क्रादन्तकारी होता है। हम
प ूँज ू ीवादी समाज में उन् हें उनक़ी इस अषनवायि षनयषत के बारे में बताना चाषहए, उनक़ी सबसे अहम माूँग यानी
रोर्जगार के हक क़ी माूँग के बारे में सचेत बनाना चाषहए और उन् हें बताना चाषहए षक उनका भषवष्प य समाजवादी
खेती, यानी सहकारी, साम ष ू हक या राजक़ीय फामों क़ी खेती क़ी व् यवस् था में ही है। के वल ऐसी व् यवस् था ही उन् ह
गरीबी, भ ख
मरी, अस र ु क्षा और अषनषितता से स् थायी तौर पर म ष ु ि षदला सकती है। दूरर्ामी तौर पर,
समाजवादी क्राषन्त ही हमारा लक्ष् य है। तात्काषलक तौर पर, रोज़र्ार र्ारडटी की लडाई और खेत
मज़दूरोंके षलएसिीश्रमक़ानूनोंकीलडाई, औरसिीकजोंसे मुषिकीलडाईहीहमारीलडाईहो
सकती है। के वल ऐसा कायिक्रम ही गाूँवों में वगि संघिि को आगे बढ़ाएगा और ग्रामीि सविहारा वगि और
अद्धिसविहारा वगि को एक स् वतंत्र राजनीषतक शषि के रूप में संगषठत करे गा और समाजवादी क्राषन्त के षलए तैयार
करे गा।
ग्यारहवींबात,यहक्राषन्तकारीप्रचारहीग़रीब, षनम्नमध्यमऔरमध्यमध्यमषकसानोंके वर्ोंकोधनी
षकसानोंऔरकुलकोंके वर्गके राजनीषतकनेतृत्वसेस्वतंत्रकरसकताहै। गरीब षकसानों के वगि क़ी भारीबहुस ख् ं या को इसके र्जररये जीता जा सकता है , षनम् न मध् यम षकसानों के भी बडे षहस् से को जीता जा सकता है और
मध् य मध् यम षकसानों के अपेक्षाकृ त उससे छोटे षहस् से को जीता जा सकता है। इसक़ी वजह यह है षक प ूँज ू ीवादी
व् यवस् था में इनक़ी षनयषत में थोडा फकि होता है। गरीब षकसान तो म ल
त: और म ख् ु यत: पहले ही सविहारा क़ी
कतारों में शाषमल होने लगता है ; षनम् न मध् यम षकसानों का एक बेहद छोटा षहस् सा अपवादस् वरूप षस्थषतयों म
मध् यम षकसान बन पाता है , द स ू रा षहस् सा गरीब षकसानों में तब् दील होता है और सबसे बडा तीसरा षहस् सा सविहारा
वगि क़ी कतार में शाषमल हो जाता है ; मध् य मध् यम षकसानों का एक छोटा-सा षहस् सा उच् च मध् यम व धनी षकसानों
में तब् दील होता है , उससे बडा षहस् सा गरीब व षनम् न मध् यम षकसानों क़ी कतार में शाषमल होता है और बाक़ी
षहस् सा सविहारा वगि क़ी कतार में शाषमल होता है। इन वगों पर प ूँज ू ीवादी अथिव् यवस् था के इन षवभेदक प्रभावों क
कारि क्राषन्तकारी राजनीषतक प्रचार और समाजवाद के प्रषत इनक़ी प्रषतषक्रया में भी कुछ अन् तर होना लाषजमी है।
लेषकनएकवर्गके तौरपरकहाजाय, तोयेमुख् य त:औरमूलत:समाजवादीक्राषन्तके षमत्रवर्गहैंऔर
इनकाधनीषकसानोंवकुलकोंसेकुछिीसाझानहींहै।
लेषकन इस क्राषन्तकारी प्रचार को लािकारी मूल्यको बचाने के षलए की जा रही िारतीय षकसान
यूषनयनकीरैलीमें नहींषकयाजासकताहै ! जोऐसाप्रस्ताविीरखताहै , वहयातोहददजे ग ़ काम ख
ग
है , याषफरहददजे ग ़ काअवसरवादीधूतगजोआपकोमूखगबनानेकीकोषशशकररहाहैऔरइसप्रषक्रया
में अपने अवसरवाद, लोकरंजकतावाद, नरोदवाद की ओर संक्रमण और दषक्षणपन्थी िटकाव को
षछपाने कीकोषशशकररहाहै , लफ़्फ़ाज़ीकररहाहैऔरसवगहारावर्ग कोधोखादेने काकामकररहा
है।
ऐसे क्राषन्तकारी प्रचार को गाूँवों के गरीबों के बीच क्राषन्तकारी शषियाूँ स् वतंत्र और स् वायत् त तौर पर ही आयोषजत
कर सकती हैं। इसके षलए खेत मर्जद र ू ों व गरीब षकसानों को संगषठत करना, उनक़ी य ष ू नयनें बनाना, उन् हें रोर्जगार
के हक के सवाल पर मनरे गा य ष ू नयनों व अन् य प्रकार के जनसंगठनों में संगषठत करना और इन संगठनों व मंचों क
र्जररये उन् हें उनके वगि षहतों के प्रषत सचेत बनाना, सविहारा वगि के साथ खडा करना और समाजवादी कायिक्रम पर
सहमत करना होगा।
यह आलेख मार्क सिवाद और भारत में आज षकसान प्रक न पर हमारी सांगोपांग अवषस्थषत को अपने आप में पेश
नहीं करता और आगे हम इस पर और षवस् तार से और सकारात् मक तौर पर भी षलखेंगे। अिीहमारामकसद
षसफ़ग इतनाथाषकमौजूदाकृषिअध्यादेशों, जारीधनीषकसानोंवकुलकोंके आन्दोलनतथाउसके
बारे में मज़दूर -वर्ीय नज़ररये को इनके षवषशष्ट सन्दिग में स्पष्ट करें। इस प्रषक्रया में हम षजस हद तक
षकसान प्रक न व कृ षि प्रक न पर आम तौर पर अपनी बातें कह सकते हैं , यहाूँ हमने उतना ही कहा है। आगे हम
भारतीय खेती में प ूँज ू ीवादी लगान, भ ष ू म स ध ु ार के प्रक न, काक तकारी सम् बन् धों के चररत्र के प्रक न और आज के दौर म
गाूँव के गरीबों, यानी मर्जद र ू ों व गरीब व षनम् न मध् यम षकसानों के राजनीषतक वगि षहतों के षविय में षवस् तार स
षलखेंगे।
• Fr
Mazdoor Bigule
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