बुधवार, 20 मई 2020

श्री हरिमंदिर साहिब पर लगे सोने की धुलाई की वर्ष 1999 से सेवा निभा रहा है गुरु नानक निष्काम सेवक जत्था

— श्री हरिमंदिर साहिब पर सोने को चढाने की सेवा भी निभा चुका है जत्था
— सोना धोने की पुरानी परमपरा के अनुसार ही सोने की धुलाई करते है जत्थे के सेवादार
अमृतसर
श्री हरिमंदिर साहिब में लगे  सोने की धुलाई की सेवा शुरू की गई है। गुरु नानक निष्काम सेवक जत्था बरमिंघम यूके की ओर से यह सेवा शुरू की गई है। इस सेवा के लिए यूके से 50 सदस्यों का जत्था श्री हरिमंदिर साहिब पहुंचा है। गुरु नानक निष्काम जत्था यूके वर्ष 1999 से ही श्री हरिमंदिर साहिब में लगे सोने की धुलाई की सेवा निभा रहा है। हर वर्ष जत्थे के सदस्य श्री हरिमंदिर साहिब में आकर इस सेवा को निभाते है। जत्थे की ओर से एसजीपीसी से यह सेवा निभाए जाने की मांग की थी। जिस को मुख्य रख एसजीपीसी की कार्यकारिणी कमेटी की ओर से गुरु नानक निष्काम सेवक जत्था के मुखी बाबा महिंदर सिंह खालसा को यह सेवा जत्थे के सदस्यों की सहायता से निभाने की जिम्मेवारी सौंपी थी। होली के एक दिन बाद शुरू की गई सेवा करने वाले  जत्थे  का नेतृतव  बाबा गुरदियाल सिंह कर रहे है। यह जत्था करीब दो सप्ताह तक  सोने की धुलाई की सेवा । इस जत्थे में इंग्लैंड , कीनिया ,कनाडा व भारत  आदि से भी सदस्य आए हुए है।
बाबा गुरदियाल सिंह ने बताया कि सोनो चढाने की सेवा जत्थे को वर्ष 1996 में सौंपा गया और  वर्ष 1999 में सोना चढाने की सेवा के बाद से  हर वर्ष सोने की धुलाई की सेवा जत्था की ओर से निभाई जाती है। करीब पांच वर्षों तक एसजीपीसी ने सोने की धुलाई की सेवा बंद रखी थी। वर्ष 2000 से लेकर वर्ष 2011 तक एसजीपीसी ने यह सेवा बंद रखी थी।  22 जुलाई 2016 को  शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की कार्यकारिणी कमेटी की ओर से दोबारा सोने की धुलाई की सेवा गुरु नानक निष्काम सेवक जत्था बरमिंघम को सौंपी गई थी। इस दौरान वर्ष 2016 में जत्थे की ओर से वर्ष में दो बार 6—6 माह के बाद सोने की धुलाई की सेवा निभाई। अब हर वर्ष जत्था लगातार धुलाई की सेवा निभा रहा है। हर वर्ष दस से 12 दिन जत्थे के सेवादार सेवा करते है। अगर उनको आदेश हो तो वह श्री अकाल तख्त साहिब पर चढे सोने की धुलाई की सेवा भी निभाते है।  जत्थे के सेवादार सेवा को सोने की धुलाई करने के लिए अपनाई जाती  पुरातन विधि  से करते है। किसी  भी  तरह का कोई केमिकल या डिटेरजेंट आदि  सोने की धुलाई  के लिए जत्थे के सेवादार उपयोग नहीं करते है। सोने की धुलाई के लिए रीठों के पानी का उपयोग किया जाता है। इस के लिए रीठे करीब तीन घंटों तक पानी में भिगो कर रखे जाते है। इस के बाद इस पानी से सोने की धुलाई की जाती है। प्रदूषण के कारण सोने का रंग फीका पडने लग जाता है। जिस की धुलाई करना जरूरी होता है। जत्थे के संस्थापक बाबा पूर्ण सिंह के आदेशों व मौजूदा मुखी बाबा महिंदर सिंह खालसा के दिशा के अनुसार ही जत्था ये सेवा निभा रहा है।
बाबा गुरदियाल सिंह ने बताया कि सेवा करने वाले  जत्थे के सारे सदस्य अमृतधारी है। जत्थे के सेवादार भाई महिंदर सिंह को पहले भी सोने के  पतरे चढाने की सेवा सौंपी गई थी। यह सेवा वर्ष 1999 में मुकम्मल हुई थी। श्री हरिमंदिर साहिब पर महाराजा रंजीत सिंह की ओर से भी सोना चढाया गया था। इस के बाद एक बार महाराजा रंजीत सिंह वंशिजों की ओर से भी सोना की सेवा करवाई गई थी।  जब श्री हरिमंदिर साहिब पर सैन्य कार्रवाई हुई थी तो उस दौरान सोने के बहुत सारे पतरों पर गोलियां लग गई थी। जिन को उतार कर एसजीपीसी ने यादगार के रूप में संभाल कर रखा हुआ है। श्री हरिमंदिर साहिब के गुबदों ,  गुबदियों और दीवारों आदि पर पहले से ही 600 किलोग्राम से अधिक सोना चढा हुआ था। उनके जत्थे की ओर से बाकी हिस्से पर सोना  चढाने की सेवा की मांग की गई थी। एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष गुरचरण सिंह टोहरा ने खालसा साजना के 300 सालाा दिवस पर सोने की सेवा करने का एलान किया था।  जत्थे की ओर से इस पर  800 किलोग्राम सोना के 40 पत्तरे चढाए गए।  जबकि पहले 25 पत्तरे चढे थे। जत्थे ने 700 से अधिक पत्तरे सोने के चढाने की सेवा निभाई।
— पंकज शर्मा 

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