गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

नानकशाही कैलंडर का मामला

-----नानकशाही कैलंडर विवाद-------

अमृतसर, 5 फरवरी:
पिछले लम्बे समय से विवादों में चले आ रहे नानकशाही कैलंडर का मामला हल होने का नाम नहीं ले रहा और अब एक बार फिर यह मामला कल पांच सिंह साहिबान की मीटिंग में विचारे जाने की संभावना है। कैलंडर के हक और विरोध वाले ग्रुपो की माँग है कि इसको मूल रूप में नानकशाही कैलंडर या बिक्रमी कैलंडर के रूप में ही लागू किया जाये।
नानकशाही कैलंडर में संशोधन सम्बन्धित अलग -अलग सिक्ख जत्थेबंदियों ने अपनी  अपने सुझाव अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह को भेजे हैं। कुछ जत्थेबंदियाँ इसको मूल रूप में बिक्रमी कैलंडर के तौर पर ही लागू करन के हक में हैं और कुछ इस में से संशोधकों को खत्म करके इसको मूल नानकशाही कैलंडर के रूप में लागू करने के हक में हैं। नानकशाही कैलंडर को संशोधन कर 2010 में लागू किये जाएँ बाद में भी सिक्ख पंथ में दुविधा बनी हुई है। शिरोमणी समिति की तरफ से गुरपर्व सुधारे हुए नानकशाही कैलंडर अनुसार मनाए जा रहे हैं जबकि देश विदेश में कई स्थानों पर मूल नानकशाही कैलंडर अनुसार गुरपर्व मनाए जाते हैं। निष्कर्ष के तौर पर एक गुरपर्व को दो -दो बार मनाया जा रहा है, जिस कारण संगतें में दुविधा वाली स्थिति है। यहाँ तक कि पिछले साल पाकिस्तान सरकार ने शिरोमणी समिति के जत्थे को वीजा  नहीं था दिया क्यूुंकि पाकिस्तान में शहादत दिवस पहले कलेंडर  की तारीख अनुसार मनाया गया था। इस मामलो बारे पिछले दिनों संत समाज के वफद ने श्री अकाल तख्त साहब के जत्थेदार को माँग पत्र दिया था। इस वफद का नेतृत्व श्री अकाल तख्त के पूर्व जत्थेदार भाई जसबीर सिंह गंजे कर रहे थे। वफद ने माँग की थी कि संगतें में बनी दुविधा को दूर करन के लिए सुधारे हुए नानकशाही कैलंडर की जगह पहले लागू बिक्रमी कैलंडर को ही लागू किया जाये जिससे सिक्ख कौम पहले की तरह एकजुट हो कर गुरपर्व मना सगे।
इसी तर्ज पर अलग -अलग सिक्ख जत्थेबंदियों के नुमायंदों ने तख्त श्री दमदमा साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी केवल सिंह का नेतृत्व नीचे जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह को मिल कर माँग पत्र दिया था कि सिक्ख संगतें में कैलेंडर सम्बन्धित दुविधा को दूर करन के लिए 1999 में पहली बार लागू किया नानकशाही कैलंडर ही फिर लागू किया जाये। इस सम्बन्धित ज्ञानी केवल सिंह ने कहा कि 1999 में जब नानकशाही कैलंडर लागू किया गया था तो उस से पहले पाँच साल इस कैलंडर बारे गहराई के साथ विचार विमर्श किया गया था। परन्तु उस समय पर भी संत समाज ने ऐतराज जताया था कि उसको भरोसो में नहीं लिया गया। इसी कारण जत्थेदार ज्ञानी पूरन सिंह के समय पर सात सदस्यता समिति बनाई गई थी, जिस में संत समाज भी शामिल था। इस समिति ने चार साल विचार चर्चा की और 2003 में नानकशाही कैलंडर लागू किया गया था। उनकें कहा कि संत समाज की एक बार संतुष्टि कराई जा चुकी है। इस लिए कैलंडर में बार -बार संशोधन करना किसी भी तरकें जायज नहीं है। उन्हों ने कहा कि 2010 में फिर सुधारे हुए कैलंडर को लागू करन के साथ पंथ दो ग्रुों में बँटा गया है। फिर इस कैलंडर को बिक्रमी कैलंडर के रूप में पंथ पर नहीं ठोसना चाहिए। बल्कि सैद्धांतिक रूप में तैयार किये नानकशाही कैलंडर को ही लागू करना चाहिए। पहले जब संशोधन की गई थी तो तब भी यही प्रभाव गया था कि हाकिम पक्ष शिरोमणी अकाली दल ने यह संशोधन संत समाज को अपने हक में करके वोटों प्राप्त करन के लिए की है और अब फिर संशोधन करन समय पर भी यही प्रभाव जा रहा है।नानकशाही कैलंडर को ले कर सिक्ख संगतें पिछले कई सालों से दुविधा में चली आ रही हैं।
- पंकज शर्मा



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