बुधवार, 8 दिसंबर 2010

हुस्न परी ने बनाया, लाल परी का आशिक

  फ्लैग - अमृतसर का वरिष्ठ पत्रकार हुआ चपड़ासी से लेकर इलाके के रिक्शा चालक का कर्जदार
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गुरू नगरी अमृतसर के एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक के पत्रकार महोदय है, जो अपने नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार विशेषण लगवाने के लिए हर दिन कोई न कोई पाखंड रचना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया हैं। वह जिसके पास भी बैठते है अपनी दुख भरी दास्तां ओर आर्थिंक तंगिया व ईमानदारी का बखान शुरू कर देते हैं। अपने आप को लखनऊ के आस पास का रहने वाला तो बताते है, लेकिन पिछले 15 साल से आज तक अपने घर परिवार से मिलने तक नहीं गए। सुनन में यह भी आया है कि पिछले चार साल से एक हुस्न परी के चक्कर में अपना सब कुछ उस पर लुटाए बैठे है। यहां तक कि सिगरेट और खैनी की पूर्ती के लिए अपने जूनियर से लेकर दोस्त मित्रो तक मांगने से नहीं कतररातें। आगे से चाहें जवाब इंकार में ही मिले, लेकिन हालात इतने नीचे गिर गए है कि गत वर्ष शहर के एक सज्जन के घर उसकी दुर्घटना के बाद हाल चाल पूछने के लिए पहुंचे। हाल पूछने के उपरांत घायल सज्जन से ही बोलने लगे कि आया तो मैं आपका दुख बांटने था, लेकिन क्या करूं खुद भी दुखी हूं। आपके ईलाज पर खर्च तो काफी हो गया है, लेकिन क्या करूं मैने अपना भी ईलाज करवाना है,जिसके लिए अगर आप मुझे तीन हजार की मदद कर दें, तो मैं आपकी भाभी के भी मुददत के बाद दर्शन कर आऊगा। आज साल से ज्यादा समय बीत गया है, लेकिन पैसे देने के लिए जनाब अभी तक तैयार नहीं है। इस वरिष्ठ पत्रकार के साथ एक ओर भी किस्सा है,जिसमें यह हुस्न परी के लिए शहर के नामी लोगों से पत्रकारी की धोंस पर घूमाने के लिए गाड़ीया ही नहीं मंगाता। बल्कि इतना अधिक खर्च कर रहा है कि आफिस के चपड़ासी से लेकर इलाके के रिक्शा चालक तक का कर्जदार हो गया हैं। कभी चाणक्य की तरह संकल्प लेने वाला यह वरिष्ठ पत्रकार अब बर्बादी के रास्ते पर जा रहा है। शहर में चर्चा का विषय बने यह पत्रकार महोदय कथाय इतनी चर्चित है कि हुस्न परी भी अब उडारी मारने फिराक में हैं। इस पत्रकार के हालात नाजुक हो गए है कि शाम ढलते है हि हुस्न परी की जगह लाल परी ढूंढने के लिए निकल पड़ते हैं। हर मीडिया कर्मचारी की जुबान पर इस महोदय का नाम चुटकले बनकर चर्चा में है।

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