सोमवार, 19 जुलाई 2010

'मी न्यूज' के लोग मुझे धमका रहे हैं : अखिलेश चंद्रा

आज इस पत्रकारिता के बदलते परिवेश को देख कर बहुत दुख होता है। मन यही सोचने लगता है कि आज की पत्रकारिता कुछ चन्द लोगों की वजह से व्यवसाय का रूप अख्तियार करती जा रही है। पत्रकारिता के जुनून व सोच वाले शायद कुछ ही पत्रकार बचे हैं, जिन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता हैं। अभी कुछ दिन पूर्व एक मशहूर फिल्म डायरेक्टर ने हमारी मीडिया के ऊपर फिल्म बनाई तो हम सभी एक छत के नीचे आ गये थे, क्योंकि कल तक हम खबर लिखते थे और आज हम खुद खबर बनने जा रहे थे। लेकिन क्या कभी हमने गौर किया है कि ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि आज पत्रकारिता का स्तर गिरता जा रहा हैं। हर व्यक्ति को मीडिया का ग्लैमर और पैसा कमाने की चाह इस ओर खीच लाती है। इन लोगों को पत्रकारिता के जज्बे एवं जूनून से कोई मतलब नहीं, उन्हें तो केवल अपने पैसे को दो से चार गुना करना होता है।

सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि इन्हें पत्रकारिता का “प” भी नहीं आता। ये पत्रकारिता के उन चन्द दलालों का अपने साथ जोड़ते हैं, जिनका ध्येय पत्रकारिता नहीं, सिर्फ दलाली हैं। उन्हें शाम होते ही शराब, मांस और पैसे की जरूरत होती है जिसका ये फर्जीवाड़े वाले बेहतर फायदा उठाते हैं और दिल खोल कर इन पर धन वर्षा करते हैं, क्योंकि ये इनके भष्विय के ड्राफ्ट होते हैं।
दो माह पर्व कुछ इस तरह का अनुभव मुझे भी हुआ। मुझे किसी ने बताया कि एक नया न्यूज चैनल आ रही है 'मी न्यूज' नाम से। मैंने वहां अपना बायोडाटा भेजा और जब मैं वहां पहुंचा तो मुझसे मेरी काबलियत के बजाये पूछा गया कि आप उत्तर प्रदेश से कितना पैसा निकाल कर देंगे? मैं बोला कि मुझे इसका कुछ भी आइडिया नहीं है, क्योंकि मैंने आज तक सिर्फ शुद्ध पत्रकारिता की है। मैं खबर और स्टोरी आपको बेहतर दे सकता हूं। शायद मेरी फेसवैल्यू को देखते हुये उन्होंने मुझे उत्तर प्रदेश का ब्यूरो चीफ नियुक्त कर दिया और कुछ समय पश्चात मुझसे न्यूज कोआर्डिनेटर का पद भी संभालने को भी कहा गया। (बिना लिखा-पढ़ी के यह सब स्वीकार कर लेना शायद मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती थी, क्योंकि जिन्हें पत्रकारिता का 'प' नहीं मालूम, वो जा रहे थे न्यूज चैनल चलाने)।
ने लखनऊ में कार्यालय बनाकर खबरों का संकलन करना प्रारम्भ किया। कुछ दिन बाद मुझे दिल्ली के एक पत्रकार मित्र ने चैनल के मालिक एवं इस चैनल की हकीकत बताई। पता चला कि इनका तो लाइसेन्स ही नहीं है। तब मैंने इस्तीफा देकर अपनी छवि बचाना उचित समझा। मेरे पारिश्रमिक का भुगतान अभी तक नहीं किया गया है। इस बात से मुझे ये तो अनुमान हो गया कि इन्हें पत्रकार की नहीं, दलाल की जरूरत थी, जो अपने चेहरे को बेच कर इनकी तिजोरी भर सकें। इस घटना से मैं काफी आहत हुआ, और अधिक जानकारी करने पर पता चला कि दिल्ली में इन लोगों की छवि अच्छी नही हैं।

मुझे लगा कि जिस तरह मैं इस फर्जीवाड़े का शिकार होते होते बच गया, कहीं और पत्रकार बंधु इस फर्जीवाड़े के शिकार न हो जायें, इसके लिये मैने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को एवं भड़ास4मीडिया को मेल भेजकर इस खबर को आम-खास लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। इसके फलस्वरूप मुझे फोन पर धमकियां मिलनी शुरू हो गयी हैं और मुझसे ये कहा जा रहा है कि तुम्हें इसका सबक जरूर सिखायेंगे।

हालांकि जब मैं पत्रकारिता में आया था तो यह सोच कर आया था कि अपनी कलम से केवल सच लिखूंगा और यह कलम कभी नही रुकेगी। लेकिन आज मन के किसी कोने में ये आशंका भी हो रही है कि इन फर्जी कार्य करने वालों की कोई अपनी छवि तो होती नहीं है, लेकिन ये मुझे किसी कृत्य में फंसा कर मेरी छवि को धूमिल करने का प्रयास जरूर करेंगे। मैं आप सभी पत्रकार बंधुओं से पूछना चहता हूं कि क्या सच्चाई लिखना गलत है? क्या पत्रकारिता के इन दलालों को इस परिसर से बाहर नहीं निकालना चाहिये? गलत काम तो ये लोग करते हैं और बदनाम हम-आप जैसे लोग होते हैं। शायद कुछ यही कारण है कि 'कल तक हम खबर लिखते थे और आज खुद खबर बन गये हैं।'


आपका सहयोगी



अखिलेश चन्द्रा

पत्रकार

लखनऊ

1 टिप्पणी:

Mahfooz Ali ने कहा…

बहुत आश्चर्य हुआ जानकर ... कि ऐसा भी होता है... मेरी कोई ज़रूरत होगी तो बताइयेगा... मैं आपके साथ हूँ... मैं भी लखनऊ से ही हूँ...

www.lekhnee.blogspot.com