जागरण के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ प्रमाण जुटा रहा हूं, शीघ्र मुखातिब हूंगा : यशवंत जी, आपने मेरा दैनिक जागरण के बारे में किया गया खुलासा छापा, उसके लिए आपका धन्यवाद। परन्तु आपने 'बागी' शब्द का जो इस्तेमाल किया है, वह मेरे मामले में उपयुक्त नहीं है। मैं दैनिक जागरण का कोई बागी पत्रकार नहीं हूं। आपने बात की है बागी होने की तो, दोस्त, मैं बागी तब कहलाता जब मैं अखबार में रहते हुए यह काम करता।
वैसे, मेरे पास 'बागी' होने के आठ साल के दौरान बहुत कारण थे, लेकिन मैं तब भी बागी नहीं हुआ। आठ साल के दौरान अखबार ने मुझे वेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं दिया, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। पिछले आठ साल से मुझे कन्वींस एलाऊंस के तौर पर मात्र 700 रुपये दिए गए, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। मेरे से जूनियर मेरे बराबर का वेतन लेते रहे लेकिन मैंने कभी वेतन वृद्धि के लिए नाक नहीं रगड़ी। मनमाने ढंग से मेरे तबादले किए गए, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। कई शीर्ष अधिकारियों ने नेताओं और धन पशुओं से मुलाकात करने के लिए दबाव बनाया, मैं तब भी बागी नहीं हुआ।
पिछले दो साल के दौरान फरीदाबाद में काम करने के बावजूद मुझे पे स्लिप पर कुरुक्षेत्र में ही स्थानांतरित दिखाया गया, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। पांच मई 2008 को फरीदाबाद स्थानांतरित करने के समय मैं अपने बच्चों के स्कूल एडमिशन पर 20 हजार रुपये से अधिक खर्च कर चुका था, कंपनी ने एक भी पैसा नहीं दिया, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। फरीदाबाद में शुरुआती दिनों में गृहस्थी जमाने के लिए 62 हजार रुपये की बीमा पालिसी 39 हजार में सरेंडर करने के बावजूद भी मैं बागी नहीं हुआ।
कई बार वेतन वृद्धि के लिए मांग करने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं होने पर कंपनी से लोन लेना पड़ा और उसका ब्याज चुकाया, तब भी मैं बागी नहीं हुआ। 26 दिसंबर 2009 को जब मेरे बच्चों की वार्षिक परीक्षा सिर पर थी, मेरा तबादला रोपड़ किया गया, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। कंपनी को मनमाने ढंग से हांकने वाले लोगों को मैंने खूब खरी-खोटी सुनाई और जिन लोगों पर विश्वास किया, उन्होंने ही पीठ में छुरा घोंपा लेकिन मैं बागी नहीं हुआ। मई 2008 से दिसंबर 2009 तक अखबार की सर्कुलेशन 46 हजार से 57 हजार पहुंची और विज्ञापन छापने वाले श्रेय बटोरने में जुटे रहे, मैं तब भी बागी नहीं हआ। श्रेय बटोरने में जुटे रहने वालों से कोई ये तो पूछता कि क्या विज्ञापन छापने से सर्कुलेशन बढ़ता है। इसके बावजूद भी मैं कभी बागी नहीं हुआ।
रीदाबाद में कार्यालय के काम को प्रभावित करने वाले लोगों के खिलाफ मेरी बात नहीं सुनी गई, उलटे उनके साथ माननीय निशीकांत ठाकुर जी के रिश्तेदार संतोष ठाकुर मेरे खिलाफ साजिश रचते रहे, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। मुख्य संवाददाता को दरकिनार कर मुख्य महाप्रबंधक जी अपने रिश्तेदार संतोष ठाकुर के कहने पर मेरी राय लिए बगैर लोगों को पदोन्नत करते रहे, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। लोगों के स्थानांतरण में मुख्य संवाददाता को दरकिनार करने के मामले में भी मैं बागी नहीं हुआ। कार्यालय का संपादकीय प्रभारी होने के बावजूद नेताओं का नाम कांटने और छांटने में संतोष ठाकुर का हस्तक्षेप निरंतर रहने के बावजूद भी मैं बागी नहीं हुआ।
वर्ष 2008 की आगरा मीट के दौरान डबचिक में ठहराव के लिए प्रबंध करने के बावजूद वाहवाही मुख्य महाप्रबंधक के रिश्तेदार लूट ले गए, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवसिर्टी से विज्ञापन की डील नहीं होने पर जब संतोष ठाकुर मुंह लटकाए घूम रहे थे और मेरी मदद से उन्हें विज्ञापन मिलने पर भी मुझे कोई क्रेडिट नहीं मिला तो मैं तब भी बागी नहीं हुआ।
2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुझे चुनाव के लिए एडवरटोरियल की जिम्मेदारी सौंपने के बावजूद संतोष ठाकुर मेरे कनिष्ठ सहयोगियों के साथ बिना मुझसे बात किए नेताओं से डील करते रहे, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। विधानसभा चुनाव में 20 लाख रुपये से अधिक का एडवरटोरियल संतोष ठाकुर ने कार्यालय के सहयोगियों के साथ इकट्ठा किया (इस हिसाब की संतोष ठाकुर द्वारा तैयार की गई लिस्ट और उनके द्वारा दी गई नामों की पर्ची मेरे पास मौजूद है।) मीनाक्षी शर्मा और समाचार संपादक श्री कमलेश रघुवंशी के बीच ठन जाने के कारण जब मामला बिगड़ा तो मुझे सामने कर दिया गया। इसके बावजूद भी मैं बागी नहीं हुआ।
घर से 250 किलोमीटर दूर जिस शहर में मेरा कोई दुश्मन नहीं था, वहां अखबार के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा मेरे खिलाफ साजिशें रची जाती रहीं, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। यूनेस्को और यूएनडेसा की कांफ्रेंस में अमेरिका और फ्रांस जाने के लिए छुट्टी की अनुमति मांगे जाने पर फ्लाइट पकडऩे के दिन ही मुझे अनुमति प्रदान की गई, मैं तब भी बागी नहीं हुआ। दोस्त, अभी तो बहुत सी बातें ऐसी हैं जो मुझे याद नहीं है और उन पर मैं विरोध दर्ज करा सकता था, लेकिन मैं कभी बागी नहीं हुआ।
दैनिक जागरण में तीन साल बाद पत्रकारों के स्थानांतरण की मांग करने वाला मैं इकलौता पत्रकार था और आठ साल के दौरान चार तबादलों को स्वीकार करने वाला भी। मेरे साथ काम करने वाले कितने जूनियर को काम के मामले में प्रमोट किया है और कितनों ने मेरे उत्साह बढ़ाने पर पत्रकारिता के क्षेत्र में उच्चतर शिक्षा की तरफ कदम बढ़ाया, इसकी एक लंबी फेहरिश्त है। फरीदाबाद तबादले के कारण दो साल तक अपनी एम.फिल. की डिग्री पूरी नहीं कर पाया और पी.एच.डी. का पंजीकरण नहीं करा पाया, उसके बावजूद भी मैं बागी नहीं हुआ। चाहता तो किसी दूसरी जगह आराम से नौकरी कर सकता था, लेकिन जानता हूं कि कौव्वा चाहे किसी भी देश के वातावरण में रह ले, उसका रंग काला ही होता है। ऐसा ही क्षेत्र मुझे पत्रकारिता का दिखाई दिया, इस कारण ही यह फील्ड छोड़ दिया।
बाकी रही मेरे इस सारे प्रयास की भूमिका तो इसका श्रेय आपको जाता है। पिछले छह महीनों से अपने काम को पटरी पर लाने के लिए प्रयासरत रहा हूं, लेकिन पत्रकारिता जगत में होने वाली हलचल को जानने के लिए भड़ास4मीडिया को नियमित तौर पर देखता रहा हूं। आपके द्वारा पिछले दिनों छापी गई पेड न्यूज के संबंध में 72 पृष्ठ की रिपोर्ट में दैनिक जागरण प्रबंधन की ओर से अच्छे प्रत्याशियों के कामों को हाईलाइट करने को अपना दायित्व बताने की सीनाजोरी दिखाने के कारण पैदा हुए क्षोभ के कारण ही मैं यह सब करने के लिए प्रेरित हुआ, ताकि पत्रकारिता जगत की अंदरुनी गंदगी को सभी लोग जान सकें। इस संस्थान में कई ऐसे लोग हैं जिनके बाप की कोई मिल नहीं चलती लेकिन वे देखते ही देखते करोपड़पति हो गए, उनकी पोल भी पूरे प्रमाण के साथ खोलूंगा। प्रमाण जुटा रहा हूं शीघ्र ही फिर आपसे मुखातिब होऊंगा।
आपका
राकेश शर्मा
fr
भड़ास4मीडिया
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