मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

वर्ष 1994 में पाक जत्थे के साथ गए श्रदालुओं ने भारत आ कर करतारपुर लांघा के लिए आवाज उठानी की थी तेज

 गुरुनानक जयंती पर सिखों को मोदी सरकार ने बड़ी सौगात दी है। कैबिनेट ने
करतारपुर कॉरीडोर पर मुहर लगा दी है। सरकार पाकिस्तान स्थित करतारपुर
गुरुद्वारे तक जाने के लिए अपने क्षेत्र में सीमा तक सड़क बनवाएगी।
करतारपुर साहिब भले ही पाकिस्तान में है पर वहां के सिख हों या भारत के
सिख हों या विदेश में बसे सिख हों, सभी के मन में करतारपुर साहिब
गुरुद्वारे के प्रति एक जैसी अटूट श्रद्धा है। आजादी के बाद से ही
करतारपुर का रास्तो खुलवाने के लिए आवाज बुलंद होती रही है। केंद्र सरकार
के फैसले को लेकर नानक नाम लेवा संगत में काफी खुशी है।
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वर्ष 1994 में पाक जत्थे के साथ गए श्रदालुओं ने भारत आ कर करतारपुर
लांघा के लिए आवाज उठानी की थी तेज
पंकज शर्मा , अमृतसर
पाकिस्तान स्थित करतारपुर में मौजूद गुरुद्वारा करतारपुर साहिब एक बार
फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है। केंद्र सरकार की ओर से करतारपुर लांघा
के लिए सीमा पर सड़ बनाने के लिए एलान से संगत में खुशी की लहर है। आजादी
के बाद से ही इस रास्ते के लिए संगत आवाज बुलंद कर रही है।  पाकिस्तान के
प्रधानमंत्री इमरान खान की ताजपोशी के दौरान पास सेना के मुखी के साथ
गिले मिल करतारपुर के लिए सीमा पर रास्ता खोलने की  केबिनेट मंत्री नवजोत
सिहं सिद्धू ने इस गुरुद्वारा के लिए रास्ते खोलने के मामले को
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया था। बताया जाता है कि सब से पहले वर्ष
1994 में इस गुरुद्वारा साहिब के लिए रास्ता खोलने के लिए पाकिस्तान के
अधिकारियों ने करतारपुर के दर्शनों के लिए गए जत्थे के सदस्यों को इस के
लिए आवाज उठाने की बात कही। कहा जाता था कि पाक सरकार यह रास्ता खोलने के
लिए तैयार है अगर भारत सरकार इस पर सहमति प्रदान करे। अब भारत सरकार ने
भी इस की तरफ हाथ बढा दिया है। आजादी के बाद से ही  गुरुद्वारा करतारपुर
साहिब के लिए रास्ता देने के लिए सिख संगठनों की ओर से आवाज उठाई जाती
रही है। सिख तो अपनी अरदास में भी दुनिया भर के इतिहासिक गुरुद्वारों के
दर्शनों के लिए प्रार्थना करते है। इस गुरुद्वारा के लिए बिना वीजा
रास्ता देने के लिए आवाज उठती रही है।
1994 के बाद जत्थे के लोगों ने  भारत आ कर इस मामले को हर धार्मिक व
राजनीतिक मंच पर उठाना शुरू कर दिया। इस के लिए बाकायदा करतारपुर लांघा
नाम का संगठन बना कर आवाज उठाई जाती रही। जिस काम के लिए सब से अधिक पहल
कदमी बीएस गुराया की ओर से शुरू की गई। 19 दिसंबर 2000 को हरपाल सिह
भुल्लर ने इस रास्ते के लिए समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित करके दावा
किया कि पाक सरकार रास्ता देने के लिए तैयार है। इस मुद्दे को बीएस
गुराया ने तत्कालीन अकाली नेता कुलदीप सिंह वडाला के साथ एक बंद कमरा
बैठक में सांझा करते हुए वडाला के कम हो रहे राजनीतिक प्रभाव को बल देने
के लिए उठाने को कहा। वडाला ने अपने साथी गुरिंदरा सिंह बाजवा , जसबीर
सिंह , उधम सिंह आदि के साथ बात करके आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी। बाद
में जसविंदर सिंह भाटिया की ओर से भी डेरा बाबा नानक में पहुच कर इस के
लिए अरदास करते हुए रास्ता खोलने का मुद्दा उठाया। परंतु भारतीय
एजेंसियों के हस्तक्षेप के चलते नेता पीछे हट गए। बीएस गुराया का तो इस
के चलते अमृतसर से बाहर दूर तबादला कर दिया गया। गुराया बाद में इस
मूवमेंट को चलाते हुए नौकरी को भी छोड़ गए और फूल टाइम संघर्ष करने लग
गए।
बाद दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना
की कोशिशों से डेराबाबा नानक में एक मचान बना कर वहां एक दूरबीन स्थापित
करवाई ताकि संगत यहां से आसानी से गुरुद्वारा करतार पुर साहिब के दर्शन
कर सके।। इस गुरुद्वारा को डेरा बाबा नानक से करतार पुर को जाने के लिए
रावि दरिया के उपर पर भी बना हुआ था। यह पुल दोहरा पुल था जिस का एक
हिस्सा रेलिंग का था और दूसरा हिस्सा सडक जैसे बना था। वर्ष 1971 की भारत
पाक जंग के दौरान इस पुल के उपर बंब गिरा का तोड़ दिया गया। जो बाद में
कभी भी नहीं बनाया गया। इतिहास में दर्ज है कि जब नवाज शरीफ की सरकार आई
थी तो उस वक्त इस बचे हुए पुल के हिस्से की लोहे की रेलिंग भी गायब कर दी
गई थी। यह पुल भारत पाक बंटवारे से पहले का था। यह पुल अंग्रेजों की ओर
से वर्ष 1927 को स्थापित किया गया था।
करतार सीमा के पास डेरा बाबा नानक से करीब 9 किलोमीटर है। डेराबाबा नानक
के निक्टवर्ती गांवों से करतारपुर साहिब के गुरुद्वारा के गुंबद का उपरी
हिस्सा आसानी से दिखाई देता है। जिस से दर्शन भारत की संगत इधर से ही
करके आत्मिक शांति हासिल कर लेती है।
श्री अकाल तख्त साहिब के तत्कालीन जत्थेदार ने इस गुरुद्वारा साहिब के
दर्शनों के लिए रास्ता देने के लिए वर्ष 1993 में संगत को इस रास्ते के
लिए पर्यास के लिए कहा था । पंजाब सरकार ने तो वर्ष 2010 के अकटूबर माह
में इस गुरुद्वारा के लिए रास्ता दिए जाने के लिए एसैम्बली में भी
प्रस्ताव पारित किया था।
करतारपुर साहिब के दर्शनों के लिए जाते रहे श्रद्धालु बीएस गोराया ने
बताया कि वर्ष 1993 —1994 तक गुरुद्वारा साहिब की हालत , वहां की साफ
सफाई और अन्य प्रबंध इतने बढिया नहीं थे। बाद में पाक सरकार ने भी संगत
की अपील को मुख्य रखते हुए इस की हालत में सुधार किया। वहां रहने के लिए
सराय के कमरों की संख्या में भी वृद्धि की। श्रद्धालु जसबीर सिंह जो
जत्थे के साथ कई बार गए है
गुरुद्वारा साहिब के दर्शनों के लिए भारत पाक के मध्य हुई संघी के अनुसार
एसजीपीसी की ओर से हर वर्ष चार बार जत्था भेजा जाता है। एक जत्था गुरु
नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर एसजीपीसी भेजती है जिस में 1800 के करीब
श्रद्धालुओं को भेजने की स्वीकृति है। वहीं वैशाखी पर भेजे जाने वाले
जत्थे में 1100 के करीब श्रद्धालुओं को भेजने की अनुमति है। महाराजा
रणजीत सिंह की बरसी पर 600 के करीब और गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस
पर भी 600 के करीब श्रद्धालुओ को भेजने की अनुमति है। इसी तरह दिल्ली
कमेटी और कुछ अन्य संस्थाए भी जत्थे के लिए अपने तय किए श्रद्धालुओं की
संख्या के अनुसार सदस्यों को गुरुधामों के दर्जन के लिए पाकिस्तान भेजती
है।
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सिख धर्म का पहला स्थान है करतारपुर साहिब

कहते है कि गुरुद्वारा करतारपुर  साहिब सिख धर्म का सब से पहला धार्मिक
स्थान है। यहां पर गुरु साहिब ने खुद एक मोहडी गाड कर करतापुर की नींव
करीब 13 माघ संमत 1527 को रखी थी। यह पर गुरु नानक देव जी करीब 10 वर्ष
रहे थे। यह वही स्थान है यहां गुरु साहिब ने साधुओं वाले वस्त्र उतार कर
साधारण व्यक्तियों वाले वस्त्र धारण कर खेती की , गृहस्थ जीवन निभाया और
जात पात के बंधन  से मुक्त करने के लिए संगत को उपदेश दिया। कहते है कि
इसी स्थान पर सब से पहले लंगर व पंगत की परंपरा शुरू की गई थी। इस जगह से
नाम जपने , बांट कर शकने और किरत करने का संदेश संगत को सार्थक ढंग से
रहते हुए समझाया गया।
करातपुर से भारत की ओर डेराबाबा नानक के पास गांव पाखोके है यहां पर रहने
वाले अजीता रंधाव के पास गुरु साहिब आया करते थे। जो गुरुघर का श्रद्धालु
था। इस गांव में गुरु साहिब के ससुर मूल चंद चोणा पटवारी रहा करते  थे।
डेरा बाबा नानक में भी से 12 किलोमीटर दूर जगह कलानौर है यहां पर राजा
अकबर की ताजपोशी की गई थी। उस वक्त गुरु साहिब ने करतार पुर में एक
धर्मशाला की भी स्थापना करवाई थी। गुरु साहिब ने यह करतार पुर  से ही
अपनी दो यात्राए  शुरू की थी। उनका परिवार भी फिर यही रहने लग पडा था।
गुरू अंगद देव जी भी अपने घोडे पर स्वार होकर करतापुर गुरु नानक देव जी
के दर्शन करने के लिए गए थे। बाद में गुरु साहिब ने उनको सिखों का दूसरे
गुरु की गद्दी प्रदान की। भाई लहना जी जो गुरु अंगद देव जी बने उन्होंने
6 वर्ष करतारपुर साहिब में ही रहते हुए गुरु नानक देव की जी सेवा की थी।
गुरु साहिब ने यही पर गुरबाणी वाली पोथी गुरु अंगद देव जी को सौंपी थी।
इतिहास में दर्ज है कि गुरु साहिब ने यही स्थान पर ही अपनी एक बाणी
ब्राह्मणा की यहां ही रचना की थी। गुरु साहिब से हिन्दू और मुसलमान दोनों
ही श्रद्धालु थे। इस लिए करतारपुर में गुरु साहिब की कब और समाधी भी बनाई
गई । इस के बाद गुरु साहिब की अस्थयिों की राख कुछ श्रद्धालुओं ने गांव
पाखोके के पास दफना दी। यहां पर गुरुद्वारा दरबार साहिब देहुरा मौजूद है।
यहां पर ही गुरु साहिब के पोते धर्म चंद ने डेरा बाबा नानक गांव बसा
दिया। इस तरह गुरु साहिब की तीन समाधे बना दी गई। दो पास्कितान और तीसरी
भारत डेरा बाबा नानक में है। एक समाध और कबर करतारपुर में है। इनको 1684
ईसवी में पक्का  बना दिया गया। डेरा बाबा नानक वाले गुरुद्वारा साहिब को
महाराजा रणजीत सिंह के आदेशों पर जरनैल सुध सिंह की ओर से सम्मत 1884 को
पक्की इमारत के रूप में बनाया गया।  इस पहले पहले राजा चूनी लाल हैदरबाद
की ओर से सम्मत 1801 में भी इस की सेवा निभाई थी।
गुरुद्वारा करतार पुर साहिब की मौजूदा इमारत की सेवा लाला शाम दास ने
1911 ईसवी को करवाई थी। वर्ष 1547 में रवि दरिया में आई बाढ के चलते
करतारपुर स्थित गुरु साहिब की कबर और समाधी दोनों बह गई थी। बाद में इस
का दोबारा निर्माण किया गया।
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यूएनओ के पूर्व मैंबर मैकडोलड ने भी  भी करतारपुर  के लिए उठाई थी आवाज

करतारपुर लांघा के लिए संगठन बना कर आवाज बुलंद करने वाले बीएस गोराया ने
बताया कि वर्ष 2008 में यूएनओ के एक पूर्व सदस्यस जोहन मैकडोलड  ने भी
करतार पुर लांघा देने के लिए आवाज उठाई थी। उन्होंने कहा था कि अगर दोनो
देश इस पवित्र धार्मिक स्थान के लिए लोगों आने जाने के लिए रास्ता प्रदान
कर दें तो यह धार्मिक स्थान साउथ एशिया में बने तनाव के हालातों के लिए
शांति का रास्ता बन सकता है। इस को लेकर मैकडोलड ने भारत के तत्कालीन
राष्ट्रपाति प्रणव मुखर्जी के साथ भी बातचकी थी। राष्ट्रपति मुखर्जी ने
भी इस संबंधी सारी रिपोर्ट लेने के बाद ब्यान दिया था कि भारत सरकार इस
पर विचार कर सकती है।
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कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी पहली सरकार के दौरान भी इस रास्ते के लिए की थी कोशिश
सिख कौम की ओर से वर्ष 2001 को भी जोरदार ढंग से आवाज उठाई थी। कैप्टन
अमरिंदर सिंह ने अपनी सरकार के पहले कार्यकाल 2002—2007 के दौरान भी इस
रास्ते को खुलवाने के लिए कोशिशें की थी। वाजपेयी सरकार ने भी इस रास्ते
के लिए पर्यास शुरू किए थे। तब पाक की ओर से कोई पहल नहीं हुई।
वर्ष 2010 मे जब पंजाब विधान सभा के तत्कालीन स्पीकर निर्मल सिंह काहलों
अमरीका गए तो वहां सिखों ने उनके उपर करतारपुर लांघा को खुलवाने के लिए
दबाव बनाया। तो इस के लिए प्रस्ताव विधायक सेवा सिंह सेखवां और कैप्टन
बाठ को पेश करने के लिए तैयार किया। परंतु बाद में मुख्यमंत्री प्रकाश
सिंह बादल ने यह बाठ और सेखवां का नाम रद्द करके प्रस्ताव खुद पेश कर
दिया। मई 2016 को भी करतारपुर लांघा के लिए कुछ सिख नेताओं ने पंजाब के
राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी को साथ मिल कर  बात की और ज्ञापन भी दिया।
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तीन सिख संगठन कर रहे है रास्ता खोलने के लिए हर माह अरदास
आज अमरीका में रह रहे सिख संगठनों के नेता करतारपुर को कौमांतरी पीस जोन
बनाने के लिए आवाज उठा रहे है। डेरा बाबा नानक में अब हर अमावस पर दोपहर
को एक बजे इस रास्ते को खोलने के लिए सिख संगठन कुलदीप सिंह वडाला और
गुरिंदर सिह बाजवा के नेतृत्व में अरदास करते है। इसी तरह एक दूसरा ग्रुप
बीएस गोराया के नेतृत्व में  हर संग्राद को डेरा बाबा नानक में रास्ता
खोलने के लिए अरदास करता है। हर पुनिमा पर भी संगत रघुबीर सिंह के
नेतृत्व में दोपहर 11 बजे अरदास करती है। एसजीपीसी की ओर से अपने हर जरनल
इजलास में इस के लिए प्रस्ताव पास किया जाता है। चीफ खालसा दीवान भी इस
के लिए प्रस्ताव पास कर चुका है।
— पंकज शर्मा

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