अर्थव्यवस्थाको गति को तेज करने के लिए नए निवेश की सख्त जरूरत है
हालांकि औपचारिकता निभाने के लिए वित्तमंत्री ने किसान और ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों से भी बजट में उनकी अपेक्षाओं कोलेकर चर्चा की है लेकिन यह किसी से छुपा नहीं है कि कारपोरेट समूहों औरफिक्की-सी.आई.आई-एसोचैम जैसे संगठित लाबीईंग समूहों की ताकत और प्रभाव के आगे वेकहीं नहीं ठहरते हैं.
वे न सिर्फ सरकार के अंदर लाबीइंग कर रहे हैं बल्कि बाहर भीअपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं. इसमें उन्हें गुलाबी अख़बारों की मदद भीमिल रही है जो बजट का एजेंडा कारपोरेट समूहों के पक्ष में तय करने में भिड़े हुएहैं.
यही नहीं, फिक्की के महासचिव राजीवकुमार ने एक बड़े अंग्रेजी अखबार में लिखकर प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून कोसरकारी खजाने की कमर तोड़ने वाला बताते हुए वित्त मंत्री को अगले बजट में उसपर अमलसे बचने की सलाह दी है. कहने की जरूरत नहीं है कि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी से लेकरविश्व बैंक-मुद्रा कोष तक सभी की सबसे बड़ी चिंता वित्तीय घाटे में बढ़ोत्तरी है.
साफहै कि वित्तीय कठमुल्लावाद फिर सक्रिय हो गया है. गुलाबी अख़बारों में रोजरिपोर्टें ‘प्लांट’ की जा रही हैं कि चालू वित्तीय वर्ष में वित्तीय घाटा का बजटअनुमान जी.डी.पी के ४.६ फीसदी से बढ़कर ५.६ फीसदी या उससे भी अधिक जा सकता है. कहाजा रहा है कि वित्तीय घाटे का यह स्तर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. यहअर्थव्यवस्था के लिए घातक है.
तर्क दिया जा रहा है कि इसे अगर इस सालकाबू में करने के लिए सख्त फैसले नहीं किये गए तो अगले साल चुनाव वर्ष का बजट होनेके करण वित्त मंत्री के लिए उसमें कोई कड़ा फैसला करना संभव नहीं होगा.
सच यह है कि किसी भी विकासशील देश मेंअर्थव्यवस्था में अत्यधिक निवेश की जरूरतों के कारण बजट में वित्तीय घाटास्वाभाविक और काफी हद तक अनिवार्य भी माना जाता है. भारत इसका अपवाद नहीं है.
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय जिस मोड पर खड़ी है वहां उसे सबसे अधिक जरूरत बुनियादीसंरचनात्मक ढांचे यानी बिजली-सड़क-रेल-बंदरगाह-पानी, सामाजिक ढांचे यानीशिक्षा-स्वास्थ्य और कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की है ताकि समावेशी विकास कोगति दी जा सके. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की धीमीपड़ती रफ़्तार के पीछे सबसे बड़ी वजह निवेश में ठहराव और गिरावट है.
असल में, दुनिया भर में छाई आर्थिकअनिश्चितता और विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं की बुरी स्थिति के कारण देश के अंदरभी निजी क्षेत्र नए निवेश से बच रहा है. ऐसे समय में निजी निवेश को भी प्रोत्साहितकरने के लिए वित्तीय घाटे की चिंता न करते हुए सार्वजनिक निवेश में भारी बढ़ोत्तरीकरने की जरूरत है. इससे निजी क्षेत्र के निवेश को भी आवेग मिलेगा.
आम बजट पेश होने में अब एक माह से भी कमका समय बचा है. बजट की तैयारियां जोरों पर हैं. वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी परअपेक्षाओं और उम्मीदों के बोझ के साथ चौतरफा दबाव भी हैं.
जैसाकि हर बजट के साथहोता है, इस बार भी बजट से पहले नार्थ ब्लाक में ताकतवर कारपोरेट समूहों से लेकरऔद्योगिक-वाणिज्यिक संगठनों और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के प्रतिनिधियों से लेकरविश्व बैंक-मुद्रा कोष के अफसरों तक की आमदरफ्त बढ़ गई है.
जैसाकि हर बजट के साथहोता है, इस बार भी बजट से पहले नार्थ ब्लाक में ताकतवर कारपोरेट समूहों से लेकरऔद्योगिक-वाणिज्यिक संगठनों और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के प्रतिनिधियों से लेकरविश्व बैंक-मुद्रा कोष के अफसरों तक की आमदरफ्त बढ़ गई है.
अपने कारपोरेट हितों कोआगे बढ़ाने और उसके अनुकूल नीतियों और बजट प्रावधानों के लिए जमकर लाबीइंग हो रहीहै. देशी-विदेशी बड़ी पूंजी इस बजट में बिना नाम लिए अपने लिए बेल आउट पैकेज चाहतीहै.
हालांकि औपचारिकता निभाने के लिए वित्तमंत्री ने किसान और ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों से भी बजट में उनकी अपेक्षाओं कोलेकर चर्चा की है लेकिन यह किसी से छुपा नहीं है कि कारपोरेट समूहों औरफिक्की-सी.आई.आई-एसोचैम जैसे संगठित लाबीईंग समूहों की ताकत और प्रभाव के आगे वेकहीं नहीं ठहरते हैं.
वे न सिर्फ सरकार के अंदर लाबीइंग कर रहे हैं बल्कि बाहर भीअपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं. इसमें उन्हें गुलाबी अख़बारों की मदद भीमिल रही है जो बजट का एजेंडा कारपोरेट समूहों के पक्ष में तय करने में भिड़े हुएहैं.
यहाँ सख्त फैसले का मतलब यह है कि बजट में वित्तीयघाटे को काबू में करने के लिए पेट्रोलियम, खाद और खाद्य सब्सिडी में कटौती,विनिवेश में तेजी और आर्थिक सुधारों के आगे बढ़ाने वाले नीतिगत फैसलों की घोषणा कीजाए.
यही नहीं, फिक्की के महासचिव राजीवकुमार ने एक बड़े अंग्रेजी अखबार में लिखकर प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून कोसरकारी खजाने की कमर तोड़ने वाला बताते हुए वित्त मंत्री को अगले बजट में उसपर अमलसे बचने की सलाह दी है. कहने की जरूरत नहीं है कि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी से लेकरविश्व बैंक-मुद्रा कोष तक सभी की सबसे बड़ी चिंता वित्तीय घाटे में बढ़ोत्तरी है.
साफहै कि वित्तीय कठमुल्लावाद फिर सक्रिय हो गया है. गुलाबी अख़बारों में रोजरिपोर्टें ‘प्लांट’ की जा रही हैं कि चालू वित्तीय वर्ष में वित्तीय घाटा का बजटअनुमान जी.डी.पी के ४.६ फीसदी से बढ़कर ५.६ फीसदी या उससे भी अधिक जा सकता है. कहाजा रहा है कि वित्तीय घाटे का यह स्तर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. यहअर्थव्यवस्था के लिए घातक है.
तर्क दिया जा रहा है कि इसे अगर इस सालकाबू में करने के लिए सख्त फैसले नहीं किये गए तो अगले साल चुनाव वर्ष का बजट होनेके करण वित्त मंत्री के लिए उसमें कोई कड़ा फैसला करना संभव नहीं होगा.
लेकिनदिलचस्प बात यह है कि वित्तीय घाटे में कटौती के लिए आमलोगों खासकर गरीबों की सब्सिडीमें कटौती को एकमात्र विकल्प बतानेवाले इस विकल्प पर भूलकर भी चर्चा नहीं करते हैंकि इसका एक तरीका सरकार की आय बढ़ाने का भी हो सकता है.
इसके लिए कारपोरेट और बड़ीदेशी-विदेशी पूंजी को दी जा रही हजारों करोड़ रूपये की कर छूटों/रियायतों का खात्माऔर कारपोरेट टैक्स में बढ़ोत्तरी का भी हो सकता है.
तथ्य यह है कि वर्ष २०१०-११ के बजट मेंअकेले कारपोरेट टैक्स में विभिन्न छूटों के जरिये कंपनियों को ८८२६३ करोड़ रूपये औरसोने-हीरे पर सीमा शुल्क में छूट के रूप में ४८७९८ करोड़ रूपये दिए गए. अगर सिर्फइन दोनों को ही जोड़ दिया जाए तो यह प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून पर होनेवालेअधिकतम व्यय के अनुमानों से भी ज्यादा है.
लेकिन इसकी चर्चा नहीं होती है. यह भी चर्चानहीं होती है कि जिस वित्तीय घाटे का इतना रोना रोया जाता है, क्या वह सचमुच, खतरेके निशान को पार कर गया है? तथ्य यह है कि दुनिया के अमीर देशों के संगठन-ओ.सी.ई.डी (ओसेड) के सदस्य देशों में वर्ष २०१० में वित्तीय घाटा औसतन जी.डी.पी के७.५ फीसदी के आसपास था जबकि इसके वर्ष २०११ में जी.डी.पी के ६.१ फीसदी के करीबरहने का अनुमान है.
सच यह है कि किसी भी विकासशील देश मेंअर्थव्यवस्था में अत्यधिक निवेश की जरूरतों के कारण बजट में वित्तीय घाटास्वाभाविक और काफी हद तक अनिवार्य भी माना जाता है. भारत इसका अपवाद नहीं है.
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय जिस मोड पर खड़ी है वहां उसे सबसे अधिक जरूरत बुनियादीसंरचनात्मक ढांचे यानी बिजली-सड़क-रेल-बंदरगाह-पानी, सामाजिक ढांचे यानीशिक्षा-स्वास्थ्य और कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की है ताकि समावेशी विकास कोगति दी जा सके. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की धीमीपड़ती रफ़्तार के पीछे सबसे बड़ी वजह निवेश में ठहराव और गिरावट है.
असल में, दुनिया भर में छाई आर्थिकअनिश्चितता और विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं की बुरी स्थिति के कारण देश के अंदरभी निजी क्षेत्र नए निवेश से बच रहा है. ऐसे समय में निजी निवेश को भी प्रोत्साहितकरने के लिए वित्तीय घाटे की चिंता न करते हुए सार्वजनिक निवेश में भारी बढ़ोत्तरीकरने की जरूरत है. इससे निजी क्षेत्र के निवेश को भी आवेग मिलेगा.
लेकिन अफसोस कीबात यह है कि कारपोरेट लाबीस्ट के इशारे पर बजट को लेकर हो रही सार्वजनिक चर्चाओंमें एक बार फिर सबसे अधिक शोर वित्तीय घाटे में कटौती और आर्थिक सुधारों की रफ़्तारको तेज करने को लेकर है.
लगता है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारोंके पैरोकारों ने अपने हालिया अनुभवों से कुछ नहीं सीखा है. सच यह है कि अमेरिका औरयूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं की मौजूदा खस्ता हालत के सबसे अधिक जिम्मेदार यह सोच हीहै.
इसने न सिर्फ २००७-०८ के वित्तीय ध्वंस की जमीन तैयार की बल्कि उसके बादवित्तीय उत्प्रेरक (स्टिमुलस) पैकेजों की मदद से उससे उबरने की कोशिश कर रहीअर्थव्यवस्थाओं पर जिस हड़बड़ी में वित्तीय अनुशासन थोपने की कोशिश की गई, उससे येअर्थव्यवस्थाएं फिर से मंदी और संकट में फंस गई हैं.
क्या वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी इससे कोई सबक लेंगे या बड़ीदेशी-विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को दांव पर लगाएंगे?बजट का इंतज़ार कीजिये.
('नया इंडिया' में २० फरवरी को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख)




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