सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

पेड न्यूज़ पर संपादक क्या करेंगे? मालिकों को पकडें

पेड न्यूज पर लगाम को लेकर चुनावी नियमों की ढील की बात से यह चर्चा फिर गर्म हुई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनावी माहौल में ही पेड न्यूज को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती रही है। पर अब समय के साथ पाठक भी होशियार हो चले हैं। उनके लिए खालिस न्यूज क्या है, इसकी समझ विकसित हो चुकी है। परिणाम सामने हैं। यदि पेड न्यूज का प्रभाव पाठकों पर व्यापकता से पड़ता है तो निश्चय ही कई नेताओं का कायाकल्प हो चुका होता।
गत वर्ष महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हुये। निजी अनुभव है, जिन नेताओं ने जमकर पेड न्यूज का सहारा लिया, कुछ को लाभ तो मिला, लेकिन अधिकतर की लुटिया डूबी। हारते ही जनता के बीच के साथ पार्टी में भी किनारे पर आ गये। उससे पहले लोकसभा चुनाव में भी पेड न्यूज का खूब धंधा चला। पर पाठकों पर इसका जादू बहुत कम चला। बदलते पत्रकारिता के माहौल में पेड न्यूज को जनता जानने-पहचानने लगी है। इसलिए इसको लेकर चुनाव आयोग किसी नियम कायदे में ढील न भी दे तो चिंता की बात नहीं है। हां, मीडिया के बहाने ढील पर मीडिया जगत के लिए यह शर्म की बात जरूर है। यदि ऐसा होता है तो पेड न्यूज की मलाई खाने वाले को नुकसान तो होगा ही अखबार मालिकों के धंधे पर भी असर पड़ेगा। पर यह नियम कायदे जो भी बने, पेड न्यूज की वैसे ही चलती रहेगी, जिस तरह से सरकारी महकमे में भ्रष्टाचार रचबस चला है। सतर्कता आयोग के लाख प्रचार के बाद भी भ्रष्टाचार बढ़ते ही गया है। इसी तरह मीडिया में पेड न्यूज का भ्रटाचार भविष्य में और फलेगा-फूलेगा। पर भुगतान के आधार पर शब्दों के माध्यम से खबरों के काले धंधे को हमेशा ही अनैतिक माना जाएगा। महौल चाहे जैसे भी बदले, सैद्धांतिक पत्रकारिता का अस्तित्व कामय रहेगी। इसी अस्तित्व के सहारे पेड न्यूज का धंधा भी फलता-फूलता रहेगा। इसे रोकने की बात हमेशा होती रहेगी। इसमें भी स्टिंग हुए हैं और भी होंगे। कुछ की पोल खुलेगी, कुछ बचेंगे। जब धंधे में यह प्रवृत्ति रचबस कर एक हो गई है तो इसे अलग-थगल करना मुश्किल होगा। पेड न्यूज को केवल राजनैतिक खबरों से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है।

फिलहाल इसके लिए प्रबुद्ध लोग पेड न्यूज को रोकने की पहल कर रहे हैं। शपथ ले रहे हैं कि वे खबरों का कालाधांधा नहीं करेंगे। पर गौर करने वाली बात यह है कि जो पहल करने वाले हैं, उनके हाथ से यह मसला अब निकल चुका है। जब तक उनके हाथ में था कुछ धन बटोरे गए। जब अखबार मालिकों की आंख खुली तो उन्होंने इसे धंधे को सीधे अपने हाथ में ले लिया। पहले से पेड़ न्यूज की कमाई करने वाले पत्रकारों के हाथ में कुछ नहीं बचा तो वे अब एकजुट हुए हैं। शोर मच रहा हंै। पेड न्यूज का गुणा-गणित जान चुके अखबार मालिक नहीं चाहते हैं कि चुनाव के दौरान उनके नियुक्त पत्रकार उसका लाभ लें और वे केवल तमाशा देखें। कई समझदार मालिकों ने तो पेड न्यूज का धंधा करने के लिए चुनाव के पूर्व अखबार लाँच किये। नये संस्करण शुरू हुये। आश्चर्य की बात है कि पेड न्यूज को रोकने के लिए जितनी भी चर्चाएं और कार्यक्रम हो रहे हैं, उसमें पत्रकार ही हिस्सा ले रहे हैं। मान लें कि किसी समाचारपत्र का संपादक यह निर्णय लेता है कि वह पेड न्यूज को नकार देगा। वहीं उस पत्र का मालिक सीधे पेड न्यूज देने वालों से समझौता कर खबर प्रकाशित करने को कहे तो संपादक क्या करेंगे? दरअसल जो संगठन पेड न्यूज को लेकर चिंतित हैं और सेमिनार आदि का आयोजन करवा रहे हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसे सेमिनार, संगोष्ठियों का वक्ता समाचारपत्रों के मालिकों को बनाये, तो शायद मालिकों को पेड न्यूज पर कुछ मंथन करने का मन बनें। ( लेखक पत्रकार हैं. संपर्क :
sanjayinmedia@rediffmail.com This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it )


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