रामचन्द्र छत्रपति हजारों अश्रुपूर्ण नेत्रों व उमड़ते जज्बातों की परवाह न करते हुए 21 नवंबर को शहादत को प्राप्त हो गए
हरियाणा के सिरसा शहर का एक धार्मिक प्रतिष्ठान कहलानेवाला डेरा सच्चा सौदा उनकी शहादत का कारण बना,जिसकी खामियां वो अक्सर अपने अखबार 'पूरा सच" सांध्या दैनिक में प्रकाशित किया करते थे
उन लोगों ने 24 अक्तूबर,करवाचौथ के दिन श्री रामचन्द्र छत्रपति पर उस समय गोलियां चलवा दी जब वो अपने कार्यालय का कार्य निपटा कर अपने घर आ चुके थे
रामचंद्र छत्रपति पर इस धार्मिक प्रतिष्ठान द्वारा किये गए हमले ने एक बार फिर यह मुद्दा चर्चा में ला दिया है कि जब कभी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी कलम उठाते हुए ताकतवर प्रतिष्ठानों की पोल खोलनी शुरू की है तभी उन्हें अपनी जान माल की सुरक्षा के लिए चिंतित होना पड़ा है और कलम के सिपाहियों पर हुए हमले यह सिद्ध करते हैं की उक्त प्रतिष्ठानों का लोकतंत्र में कोई विश्वास नहीं है और वे कानून व सरकार को अपनी रखैल से ज्यादा कुछ नहीं समझते
सिरसा में डेरा सच्चा सौदा कई बरसो से स्थापित है लेकिन गद्दीनशील गुरमीत सिंह के आने के बाद डेरे की सम्पतियों में गुणात्मक इजाफा हुआ है तडक भड़क देखकर अनुयायियो की संख्या बढ़ना भी स्वाभाविक है
डेरा के पास इस समय अरबों रुपये की सम्पत्ति है बावजूद इसके कि वो कोई सार्वजनिक चढ़ावा स्वीकार नहीं करते
आसपास के गावों के लोग अपनी जमीन डेरे को बेच रहे हैं या रहम करके दे रहे हैं
हर वक़्त हजारों लोग चौदह-पंद्रह घंटे बिना मजदूरी लिए काम कर रहे हैं
ऊपरी तौर पर यह सारा मामला आस्था से जुड़ा लगता है,लेकिन श्री रामचन्द्र छत्रपति की खोजी निगाहें जानती थी कि यह मामला सिर्फ आस्था का नहीं है और उन्होंने अपनी तफतीश व खोजबीन पर आधारित कई तथ्यपूर्ण खबरें अपने अखबार में प्रकाशित की,वो चाहे डेरे के लोगें द्वारा आस-पड़ोस के लोगों को धमकाकर जमींन बेचने की खबर हो चाहे उन्हें तंग करके जमींन बेचने के लिए विवश करने की खबर हो,चाहे डेरे के लोगों द्वारा बेईमानी से अपने स्कूल की टीम को जितवाने का मामला हो,चाहे अनुयायियों की जीप से कुचलकर एक बच्ची के कुचले जाने के बाद उलटे अनुयायियों द्वारा पीड़ित परिवार को धमकाने का मामला हो, चाहे तारों में कुंडी डालकर सालाना सत्संग के समय शहर को चमकाने की खबर हो या फिर किसी साध्वी के यौन-शोषण की सनसनीखेज खबर हो,रामचंद्र छत्रपति ने हर खबर को गहरी खोजबीन के बाद प्रकाशित किया,जिनके बारे में डेरा अनुयायियों के पास कोई तर्क या खंडन नही होता था
शुरू में लोगों ने छत्रपति को समझाया कि एक धार्मिक प्रतिष्ठान के खिलाफ आपको कोई खबर प्रकाशित नहीं करनी चाहिए,बेशक तुम सरकार की खामियों को उजागर करो
लेकिन जब एक साध्वी ने अपने व अपने जैसी अन्य साध्वियों के यौन-शोषण की बाबत एक चिठ्ठी प्रधानमंत्री सहित अनेक गणमान्य व्क्तियों को भेजी और वो चिठ्ठी लीक होकर सार्वजनिक हो गई तो कुछ लोग छत्रपति के साथ आ खड़े हुए
इससे छत्रपति का हौंसला बड़ा और उन्होंने अपनी कलम की बेबाकी और तेज कर दी और अंतिम दिन,गोली लगने से पहले,उन्होंने मुझसे बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा था कि मै जल्द ही डेरे की आमदनी के स्त्रोतों का भंडाफोड़ करने वाला हूँ
और उनके पास इस बात की पुख्ता जानकारी थी कि डेरे कि आमदनी का मुख्य स्त्रोत वो नहीं है जो सार्वजानिक तौर पर जाना जाता है
श्री रामचंद्र छत्रपति की बेबाकी और सुरक्षा के प्रति लापरवाही उनकी मौत का कारण बनी
उनकी मौत से तकरीबन तीन माह पहले सरकार ने सभी पत्रकारों का बीमा किया लेकिन छत्रपति ने इस सुविधा को लेने से इनकार कर दिया
योगेन्द्र यादव सहित अनेक शुभचिंतको ने उन्हें अपनी सुरक्षा के इंतजाम करने की हिदायत दी लेकिन उनकी दिलेरी ने इस बात की भनक उनके शुभचिंतको को भी नहीं लगने दी कि उनकी जान को कोई खतरा है,बावजूद इसके कि उन्हें जान से मार डालने कि कई धमकियाँ व योजनाएं उनकी जानकारी में आ चुकी थी
20 अक्टूबर,2002 को सिरसा में 'पूरा सच' के बैनर तले विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमे श्री योगेन्द्र यादव मुख्य वक्ता थे
गोष्ठी के अंत में मैंने जब छत्रपति जी से पूछा कि आए हुए अतिथियों का आभार व्यक्त्त करने के लिए किसका नाम अनाउंस करूँ तो वे बोले कि तुम विश्वजीत शर्मा का नाम अनाउंस कर दो,लेकिन व्यक्तिगत रूप में न जाने मुझे क्यों ऐसा लगा कि छत्रपति जी अभी आम जन से ढंग से रूबरू नहीं हुए हैं और अनायास ही मैंने आभार व्यक्त करने के लिए छत्रपति जी का नाम अनाउंस कर दिया
उस समय बोली गई उनकी अंतिम पंक्तियाँ उसी तरह इतिहास बन गई,स्लोगन बन गई जिस प्रकार श्रीमती इन्द्रा गाँधी के एक रैली में बोले हुए अंतिम शब्द "मेरे शरीर का एक-एक कतरा....."स्लोगन बन गए थे
छत्रपति ने तब कहा था कि "न जाने क्यों मेरे अन्य पत्रकार साथी बेबाकी के साथ नहीं लिख पा रहे हैं
उनके पास सामर्थ्य है शक्ति है,और वो वक़्त जल्दी ही आएगा जब मेरे साथी पत्रकारों कि कलम भी बेबाकी के साथ चलेगी
" उनके ये अंतिम वाक्य स्लोगन बनकर 'पूरा सच' के कार्यालय की दीवारों पर चस्पा हो गए हैं और साथ ही ये वाक्य उन साथी पत्रकारों के दिल पर भी चस्पा हो गाए हैं जो अब उनकी कलम की नोक बनकर समाज के कंटको के सीने में चुभ रहे हैं
-- वीरेन्द्र भाटिया
* सामायिक वार्ता (2002) से साभार
Tags: छत्रपति, पूरा, रामचंद्र, सच, सिरसा
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